ललित कुमार द्वारा लिखित, 20 फ़रवरी 2012 सायं 6:00
एक नई रचना… बस यूं ही लिख दी…
मैं ख़्वाहिशमंद हूँ
असीरी का
अपनी ज़ुल्फ़ों को
आज़ाद कर दे
काली लपटों की नर्मगी
मुझपे बिखरा दे
आजा कहीं से तू
रात से पेशतर जहां में
रात कर दे
अब आ भी जा के
गुलो-खुश्बू हुआ है
ज़र्रा-ज़र्रा चमन का
ऐसे में तन्हा शाम
कितनी भारी-भारी है
तेरे होने का अहसास
मौजूद है आस-पास
मगर…
खाली-खाली-से
पहलू को मेरे
आके ओ हमनशीं
आबाद कर दे
मैं ख़्वाहिशमंद हूँ
असीरी का
अपनी ज़ुल्फ़ों को
आज़ाद कर दे
ललित कुमार द्वारा लिखित, 22 जुलाई 2006 सायं 6:00
जुलाई 2006 में जब मैं कविता कोश वेबसाइट की रचना कर रहा था -उस समय की लिखी हुई एक रचना…
हैरान हूँ मैं दर पे नामाबर को पा कर
आता नहीं यकीं के ख़त मेरे नाम है
जिस्म को झुकाना तो बस रवायत है
रूह झुके सजदे में तभी सच्चा सलाम है
अर्सा हुआ मुझको मरते हुए ऐ ज़िन्दगी
अब आई हो कहो, मुझसे कोई काम है
हमसफ़र-ओ-ताक़त नहीं हौंसला-ओ-चाहत
क्यों बिछी मेरे आगे ये राहें तमाम हैं
उनकी आंखो से कहीं आंसू ना छलक पड़ें
उनको ना सुनाना ये ललित का कलाम है
ललित कुमार द्वारा 29 दिसम्बर 2004 को लिखित
एक बहुत पुरानी कविता…
क्या अंतर पड़ जाएगा, क्या कमी हो जाएगी
हम ना होंगे, ये कोयल गीत फिर भी गाएगी
रंगो का आंचल ओढ़े, फूल फिर भी खिला करेंगे
हम ना होंगे, ये तितलियाँ इसी तरह मंडरांएगी
हर सांझ ढले अंबर, तारक मणियों का थाल बनेगा
हम ना होंगे, भोर ऐसे ही किरनें नई फैलाएगी
संसार यूँ ही गतिमान रहेगा, किन्तु लगता है
हम ना होंगे, कीमत प्रेम की तब ही समझी जाएगी
ललित कुमार द्वारा 09 अक्तूबर 2003 को लिखित
यह कविता मैंने 09 अक्तूबर 2003 की सुबह का अखबार पढ़ने के बाद लिखी थी। अखबार में पहले ही पन्नें पर एक रुला देने वाली ख़बर छपी थी। दिल्ली के बुद्धा जयंती पार्क में सेना के चार जवानों ने मिलकर एक 17 वर्षिया कॉलेज जाने वाली लड़की का बलात्कार किया था। विडम्बना यह भी कि ये चारों लोग राष्ट्रपति भवन की सुरक्षा में तैनात थे! उस दिन सारा समय मैं एक सदमें की सी स्थिति में रहा।
भूले क्यों मानवता का अर्थ?
कुछ जो दूजों से अधिक समर्थ
पापी अट्टाहस करते घूम रहे, सहमी हुई है हर सुकुमारी
मानवता आज बैठी है हारी
रिश्तों का मतलब रहा नहीं
नारी ने क्या-क्या सहा नहीं
असंख्य रूप धरे दुशासन, करते है वस्त्रहरण की तैयारी
मानवता आज बैठी है हारी
सतयुग में यह आरम्भ हुआ
शिखर कलयुग में इसने छुआ
क्यों अत्याचार नारी पर होता? है मन पर बोझ बड़ा ये भारी
मानवता आज बैठी है हारी
जग का आधार जिसे वेद मानते
फिर क्यों हम उसको तुच्छ जानते?
जीवन फूल उपजता जिससे, जग में नारी ही तो वह क्यारी
मानवता आज बैठी है हारी


