जिसकी याद हमें है आती

Author: Lalit Kumar  © All rights reserved
Published: February 3, 2012
ललित कुमार द्वारा लिखित; 26 अगस्त 2003
एक पुरानी कविता…
जिसकी याद हमें है आती
चलो मन ढूंढे अपना साथी
हस्ती जिसकी सागर जैसी
नहीं जो इक नदिया बरसाती
जिसकी याद हमें है आती
चलो मन ढूंढे अपना साथी

लज्जा से झुकती हैं वे
उत्सुकता से उठती हैं
अधरों से भी अधिक मुखर
बातें प्रेम की करती हैं
कजरारी, मनभावन, चितवन
ऐसी हैं अँखिया शरमाती
जिसकी याद हमें है आती
चलो मन ढूंढे अपना साथी

झर झर झर झर झरने झरते
जहाँ पक्षी प्रेमी कलरव करते
सुगंध उठाए हवा है चलती
किरन फैलाये उषा निकलती
बसी पहाड़ो बीच कहीं पर
सुन्दर-सी वो प्रेम की घाटी
जिसकी याद हमें है आती
चलो मन ढूंढे अपना साथी

मिली नहीं बस कल्पना है
वो स्वप्न-गृह की अल्पना है
सुन्दर-सा घर होगा अपना
सच होगा मेरा देखा सपना
कल्पना के सत्य होने की
है मुझे प्रतीक्षा दिन-औ-राती
जिसकी याद हमें है आती
चलो मन ढूंढे अपना साथी

हस्ती जिसकी सागर जैसी
नहीं वो इक नदिया बरसाती

जिसकी याद हमें है आती
चलो मन ढूंढे अपना साथी

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  • Anupama

    स्वप्न गृह की अल्पना अब जल्दी ही वास्तविक धरा पर अवतरित हो!

    शुभकामनाएं!

  • Mamta jain

    aapki is kavita se kuchh yaad aa raha he. lagta he mujhe bhi apni diary kholni hi hogi

  • http://www.facebook.com/people/Vinay-Kumar/100003225205628 Vinay Kumar

    mujhe yeh kavita achhi lagi

  • http://www.facebook.com/people/Vinay-Kumar/100003225205628 Vinay Kumar

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  • anjani kumar

    kalpana ya satya ye to aap hi jaane …pr wastav me sabd nahi hai tarif ke liye .