| ललित कुमार द्वारा लिखित, 01 फ़रवरी 2010 | |
| कभी-कभी लगता है कि मैं इस युग के लिये बना ही नहीं। यहाँ मुझे अपने जैसा कुछ नहीं दिखता। प्यार, विश्वास, एक दूसरे के प्रति सम्मान, समपर्ण -यह सब संसार से मिट गया सा लगता है। अब लोग स्वार्थी हो गये हैं और एक ऐसी अंधी दौड़ में भाग ले रहे हैं जिसका उद्देश्य क्या है उन्हें खुद ही नहीं पता। खै़र, यही सब भाव इस नज़्म-रूपी रचना में प्रकट हुए हैं। | |
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दिल की आरज़ू है कि मिले कोई जिसकी कैफ़ियत रंगो-सी हो! जो मिल जायें एक-दूजे में तो फिर कभी जुदा ना हों फिर ना अपनी कोई शख़्सियत रहे लेकिन मिलते कहाँ हैं ऐसे लोग साथ चलते हमराही भी अब लोग अब रंगों की तरह नहीं रहते काश! |
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- आओ ज़िन्दगी एक बार गले मिल लें
- ओ पेड़… मैं समझ सकता हूँ
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- प्यार की हक़ीक़त
- बड़ा कमाल आज हुआ है
- हम तुम्हे अपने दिल में रखेंगें
- आधा चांद
- कृष्ण प्रेम और ललित प्रेम
- मैनें एक परी को मित्र बनाया
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- मैं तुमको याद करूँगा
- हिम का एक कण
- कर तुम्हारा पाने को, जाने क्या करना होगा
- गरज तो रहे हो नभ, पर बरसोगे कब?
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