| ललित कुमार द्वारा लिखित; 07 अप्रैल 2005 | |
|
आकाश असीमित हो तो हो नन्हा-सा, पर अपना हो जो उस नीड़ के प्रेम में पड़ कर, अपना सारा जीवन खोते हैं कुछ पंछी ऐसे होते हैं आया नहीं, पर अब आ जाए उठाया मधुमास का आनंद |
|
|
Lalit's Fan Club on Facebook
Also, subscribe by email
Also, subscribe by email
-
मेरी कुछ और कविताएँ
- मेरी रची रचनाएँ
- इल्तिज़ा-ए-ज़र्रा
- कोमल मेरे हृदय द्वार
- मेरा वजूद इक सराब है
- हृदय का प्याला
- ज़िन्दगी श्वेत श्याम हो गई है
- हर तारे का एक तारा साथी
- तेरी मेरी राहें
- कोई बात नज़र नहीं आती
- कहार पालकी के
- मैं ख़्वाहिशमंद हूँ
- हैरान हूँ मैं दर पे नामाबर को पा कर
- हम ना होंगे
- मानवता आज बैठी है हारी
- तुम्हारे हाथों की छुअन
- जिसकी याद हमें है आती
- कल जाने क्या होगा, इस बेक़रारी में नए हैं
- सोचता हूँ उस रोज़ इक ग़ज़ल लिखूँ
- नहीं चाहिए ऐसा प्यार
- ग़मे-हयात को मैनें लफ़्ज़ों में पिरोया है
- पिंजरा और मैं
- दोस्त कच्चे कान के
- ओ बंजारे दिल आओ चलें अब घर अपने
- गुच्छा लाल फूलों का
- मैं चाहता हूँ
- जज़्बा-ओ-अहसास
- जी सकने का आधार
- अब ये वहम दिल में और पल नहीं सकता
- दुश्मन है क्या ऐ हवा
- ज़िन्दगी एक बारकोड है
- ज़िन्दगी मेरे साथ-साथ चलना
- मैं बीत रहा हूँ प्रतिपल, मेरा जीवन बीत रहा है
- थामोगी या छोड़ोगी, मेरा हाथ ज़िन्दगी
- देखो, तुम ज़िद ना करो…
- निस्तब्ध से जीवन में
- मेरे गीतों की गलियों में
- आज मेरा मन उदास है
- इक खिड़की की याद
- हाँ, मैं एक बुनकर हूँ
- मैं उजला ललित उजाला हूँ!
- तुम हो भी और नहीं भी
- ललित वर्ष
- नूतन वर्ष तुम उनको लाना
- ओ पेड़, वो तो अमर बेल थी
- कुछ पंछी ऐसे होते हैं
- कल रात जब मेरी तुमसे बात हुई
- तुम क्षितिज बनो तो बनो
- बिना तुम्हारे दीवाली फिर
- आपके सीधे पल्ले में ये दिल अटक गया
- ओ पेड़… तुम्हारे हौंसले को…
- ओ पेड़… याद बहार की आती है
- अब मैंने पर खोल लिए हैं!
- प्रयत्न
- ओ पेड़… सकारात्मक सोचो!
- ये अंगूठी वापस नहीं लौटी
- ओ पेड़… तुम्हारा मीत खो गया है
- आओ ज़िन्दगी एक बार गले मिल लें
- ओ पेड़… मैं समझ सकता हूँ
- गंतव्य
- प्यार की हक़ीक़त
- बड़ा कमाल आज हुआ है
- हम तुम्हे अपने दिल में रखेंगें
- आधा चांद
- कृष्ण प्रेम और ललित प्रेम
- मैनें एक परी को मित्र बनाया
- दुख को तेरा दर याद रहे
- तुम कल्पना साकार लगती हो
- सूरज और मैं
- मैं तुमको याद करूँगा
- हिम का एक कण
- कर तुम्हारा पाने को, जाने क्या करना होगा
- गरज तो रहे हो नभ, पर बरसोगे कब?
- सावन गीत
- मैं अकेला मेरा मन अकेला
- मन मरूस्थली
- ये सावन के मेघ
- एक दोस्त (माधवी के लिए)
- मुझे कुन्दन बनने की चाह
- तुम बैठी ऐसी लगती हो
- एडिनबर्ग की सुबह
- आहत मन, विकृत शरीर
- रात से सुबह तक
- वो एक पल आया था
- रंगो जैसे लोग… नहीं होते
- स्वप्न से स्मृति तक
- हे झील, मुझे क्षमा करना
- ओ पेड़, तुम गिर क्यों नहीं जाते?
- किसी ख़ामोश शाम को
- बैसाखियों से बड़ी ज़िन्दगी
- बस इक बार
- अभिव्यक्ति
- मेरी कल्पना मेरा घर…





