हिम का एक कण

ललित कुमार द्वारा लिखित, 01 अगस्त 2010
आखिरकार एक नई रचना लिखी गई है। जीवन-दर्शन पर अधारित यह कविता हिम के एक कण की कहानी कहती है और इसके माध्यम से मनुष्य जीवन के सत्य को बताती है।
मैं हिम का एक कण हूँ

अभी-अभी मैं
आकाश की स्वप्निल ऊँचाईयों से
इस धरती पर उतरा हूँ
आप इसी को जन्म लेना
या अवतरित होना कहते हैं ना?
परंतु सच तो ये है कि मेरा अस्तित्व
यह “जन्म” लेने से पहले भी था!
अब तो बस मैं इस धरा पर आया हूँ!
मेरे इस क्षणभंगुर शरीर के
जलधर पिता और जल है मेरी माता
और पवन रही है मेरी भाग्य विधाता

पवन के हिंडोले में झूलता हुआ
नीचे मैं उतर रहा रहा था
हो सकता है गिरता गुलाब की पंखुरी पर
लेकिन पवन को ये नहीं भाया
और हवा का इक झौंका मुझे
नाली किनारे काई पर ले आया
अब घास की दो पत्तियाँ
बहते गंदे पानी में अटकी
पॉलीथीन की एक पन्नी
और काई का फैलाव
यही मेरा समाज है, विश्व हैं

इस धरा पर मेरा जीवन
आरम्भ हो चुका है
ज़रा सोचिए जीवन क्या है?
जन्म-मृत्यु के बीच बस कुछ पल!
और संसार क्या है?
आपकी परिधि में आने वाला
विश्व का हिस्सा
बस एक छोटा-सा हिस्सा!

संसार, जीवन और निज-महत्व
इनके बारे में मुझसे पूछिये
मुझे देखिये, जानिये, समझिये
और आप सत्य को जान जाएंगे

चलिये बातें बहुत हो चुकी
देखिए मैं पिघलने लगा हूँ
अति लघु तो पहले था ही मैं
अब और क्षीणकाय बचा हूँ
आपकी भाषा में कहूँ तो
मैं बूढ़ा हो चला हूँ!
आपके कुछ पल ही बीते हैं
मैं पूरा जीवन जी चला हूँ!

मैं अगले ही पल मिट जाऊँगा
आप कहेंगे कि मैं मर जाऊंगा
पर पिघले जल के रूप में तो
मेरा अस्तित्व बना ही रहेगा
क्योंकि मैं अनादि हूँ, अनंत हूँ
मैं अमर हूँ!

मेरे जीवन के क्षण इतने कम है कि
मुझे जीने का अवसर तो मिलता है
लेकिन गर्वित होने का समय नहीं!
मिट जाने का सत्य मेरे समक्ष
सर्वदा खड़ा रहता है
मैं विनीत सदा रहता हूँ
जीवन बहता रहता है
आप ना जाने क्यों और
किन बातों का
गर्व, अभिमान करते हैं
मैं तो जीवन को जीता हूँ
आप जीते हुए भी मरते हैं!

आप सत्य ढूंढते रहते हैं
सुख की खोज में पड़ते हैं
मैनें दुख को भी अपनाया है
मैं सुख का भी मैं एक क्षण हूँ

मैं हिम का एक कण हूँ!

  • Anupama

    geeta ke dwitiya adhyaye mein ek shlok hai….
    “avyaktadini bhutani vyakta madhyani bharat!
    avyaktnidhnanyewa tatra ka paridevna!!”

    aapki yah kavita padhte hi pehle to geeta ka dwitiya adhyaye sajeev ho utha… khaas kar upar udhrit yah shlok!
    jeevan ek padao hi to hai….

    jeevan darshan ko himkann ke madhyam se bada accha rekhankit kiya hai!
    ye hai mere bhaiyya ki kavita:)
    us prernapurna kshan ko pranaam jisne aapse itni saargarbhit rachna karwayi!!!!!!!!!!!!!

  • Anupama

    आपके कुछ पल ही बीते हैं
    मैं पूरा जीवन जी चला हूँ!

    adwitiye …tathya!
    aksharsah satya!!

  • Abha

    आप ना जाने क्यों और
    किन बातों का
    गर्व, अभिमान करते हैं
    मैं तो जीवन को जीता हूँ
    आप जीते हुए भी मरते हैं!

    is him ke kan ko padhkar to thandak pad gayi hriday me….
    likna chhodiye mat…apne pathakon apne is jeevan darshan se vanchit mat rakhiye
    saadar!

  • Manish

    Lalit ji ….is kavita ka doosra pahlu bhi likhiye…agar wo Him Ka Kan gulaab ki pnkhudiyon me pad jaata toh?

  • vandana gupta

    अपनी पोस्ट के प्रति मेरे भावों का समन्वय
    कल (9/8/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
    और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

  • Vinay

    बहोत ही सुंदर कविता…
    it inspired me a lot…thanks Lalit

  • Ashutosh

    Bakwaas kavita.

  • Kumar_ajeet

    I agree with u ashutosh. Such poems come dime a dozen.

  • Lalit Kumar

    आशुतोष, अजीत

    आप दोनों की राय सर-आंखों पर… आपकी ईमानदार टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद… मैं इससे बेहतर लिख सका तो मुझे खुशी ही होगी 🙂

    ललित

  • Kavita

    “Kavitaain tou sundar aur sachha madhyam hain apni Bhavnaon ko Vayakt karne ka” yeh aap hi se seekha hai lalitji, ki kaise abhivayakti ka khayaal rakhana hai. Akksar apki kaitaayain sach kehti hain…Kadwa sach!

    बहते गंदे पानी में अटकी
    पॉलीथीन की एक पन्नी
    और काई का फैलाव
    यही मेरा समाज है, विश्व हैं

    Uprookt panktiyaan…hamare samaaj ka ek pehloo hai, jise virle hi darsaate hain.

    I agree with Anupamaji n thankful to you for such a nice and hard lesson of Life! This moment, this instant, is important, not some unknown time in the future. Today, this very day, is what matters.

    Regards!

  • dharmendra kumar singh

    बैसाखियों से बड़ी जिन्दगी के बाद आपकी दूसरी सबसे अच्छी कविता, लगे रहिए।

  • मृदुल कीर्ति

    जीवन क्या है?
    जन्म मृत्यु के बीच बस कुछ पल!
    जीवन दर्शन को उजागर करती, मर्म के परतों को खोलती, अंतस में यथार्थ का आभास करती एक दार्शनिक रचना है.
    अंतस में अध्यात्म की ऊर्जा, अंतरिम यथार्थ की पथ गामी हो रही है. शाश्वत सत्य को उजागर करती एक उच्च कोटि की रचना.
    हम सब हिम के कण ही तो हैं.

  • Shrddha8

    संसार, जीवन और निज-महत्व
    इनके बारे में मुझसे पूछिये

    क्योंकि मैं अनादि हूँ, अनंत हूँ
    मैं अमर हूँ!

    मैं तो जीवन को जीता हूँ
    आप जीते हुए भी मरते हैं!

    आप सत्य ढूंढते रहते हैं
    सुख की खोज में पड़ते हैं
    मैनें दुख को भी अपनाया है
    मैं सुख का भी मैं एक क्षण हूँ

    itne sare atoot akatay satay ek hi kavita mein ..
    bahut gahri baaten bahut kuch sochne aur chitan par vivash karti hui

  • MayankAwasthi

    प्रिय श्री ललित जी ,
    कविता का स्पर्श स्पन्दन देता है । पहले राजेन्द्र अवस्थी जी काल -चिंतन लिखते थे “कादम्बनी” में उसकी याद दिलाती है आपकी कविता । बहरहाल क्या याद आया लिखता हूं- गीता में भगवान ने कहा है “सभी प्राणी जन्म से पहले बिना शरीर वाले और म्रत्यु के बाद बिना शरीर वाले होते हैं उस
    विषय में शोक करना उचित नहीं है “
    दूसरा पैरा “शिकेब जलाली” की याद दिलाता है ” मै शाख से उड़ा था सितारों की आस मे , मुरझा के आ गिरा हूँ मगर सर्द घास में ” सोचो तो सिल्वटों से भरी है तमाम रूह , देखो तो इक शिकन भी नहीं है लिबास में ” फिर भी ये पंक्तियाँ

    लेकिन पवन को ये नहीं भाया
    और हवा का इक झौंका मुझे
    नाली किनारे काई पर ले आया
    अब घास की दो पत्तियाँ
    बहते गंदे पानी में अटकी
    पॉलीथीन की एक पन्नी
    और काई का फैलाव
    यही मेरा समाज है, विश्व हैं” अपनी मौलिकता और विशिष्टता के कारण उपलब्धि की श्रेणी में आती है , बधाई
    ज़िन्दगी के फल्सफे पर बहुत कुछ कहा गया है

    तारों से और बात मे कमतर नहीं हूँ मै
    जुगनू हूँ इस्लिये कि फलक पर नहीं हूँ मै

    दरिया -ए गम में बर्फ के तोदे की शक्ल में
    मुद्दत से अपने क़द के बराबर नहीं हूँ मै
    कविता का सम्पूर्णन आपने आशावाद और यथार्थ के साथ किया है – मुझे कविता पसन्द आयी -मुबारक

    कैदे शबे- हयात बदन में ग़ुज़ार के
    उड़ जाऊँगा मै सुबह अज़ीयत उतार के

    इक धूप ज़िन्दगी को यूँ सहरा बना गयी
    आये न भूल कर कभी मौसम बहार के

    सीलन को राह मिल गयी दीमक को सैरगाह
    अंजाम देख लीजिये घर की दरार के
    मयंक अवस्थी -नागपुर