Category Archives: हिन्दी कविताएँ

तेरा पारितोषिक

ललित कुमार द्वारा लिखित, 1 अगस्त 2004
जीवन कर्म प्रधान है और जीवन जीने का शायद सबसे उत्तम तरीका कर्मयोगी हो जाना है। कर्तव्य पूर्ण करने के बाद मिलने वाली आत्मिक संतुष्टि को ही अपना पारितोषिक मानना चाहिए…
कर्तव्य-निष्ठा से तूने, यह स्वप्न भी साकार किया
जीवन-पथ का यह मोड़ भी, तूने अविचल पार किया

मुड़ कर ना देख तूने, कितना महत है काम किया
सोच नहीं कि कितना थोड़ा, तूने है आराम किया

मत विचार कर अब आगे, इसका कैसा फल होगा
सोच तुझे अब क्या करना, आने वाले कल होगा

एक राह खत्म होती है, तो दूजी राह हम पाते हैं
यूँ ही जुड़ कर असंख्य रास्ते, जीवन-पथ बनाते हैं

बस कर्तव्य किये जा, यही तो है गीता में घोषित
यह कार्य किये की संतुष्टि ही, तेरा पारितोषिक

सागर कभी डूबता नहीं

ललित कुमार द्वारा लिखित, 26 अगस्त 2012
आज सागर का दिल बेचैन है

उसके सीने पर तैरती
बेढब कारोबारी नौकाओं और
प्यार की हर सुंदर कश्ती की
सांसे… अटक गई हैं
आज सागर का दिल बेचैन है
आज ना जाने क्या होगा

अपार का विस्तार जैसे
खुद में ही सिमट गया है
सब कुछ, कितना ख़ामोश
कितना चुप-सा हो गया है
आज ना जाने क्या होगा

हवाओं की हरहराहट ने
लहरों के घोर गर्जन ने
अचानक पनाह ले ली है
डरा देने वाले सन्नाटे में
आज ना जाने क्या होगा

हर कश्ती, हर मछली, हर शहर
जवां होने को तैयार हर लहर
हर थमी हुई, भुला दी गई सांस
दुगनी गति से धड़कता हर दिल
बस यही सोच रहा है
आज ना जाने क्या होगा

चुप्पी साधे, हाथों को बांधे
सिर झुकाए खड़ी कायनात को
एक सहमी-सी आंशका है
इस ख़ामोशी के गर्भ से
ऐसे तूफ़ान के आने की
जिसके बाद कुछ नहीं रहेगा

क्या सागर आखिरकार
अपना ज़ब्त खो देगा?
अपनी सीमाएँ तोड़ देगा?
हाँ, शायद तोड़ ही देगा
आखिर ज़ब्त की भी तो
एक सीमा होती ही है
पर शायद ऐसा ना भी हो
क्योंकि सागर ने खुद ही तो
अपने को सीमाबद्ध किया है
वरना भला प्रकृति में कौन है
जो अपार को बांध ले?

आज सागर का दिल बेचैन है
आज ना जाने क्या होगा…
कयास सभी लगा रहे हैं
और सब यह भी जानते हैं
कि कुछ नहीं होने वाला
उसका ये नया दुख भी
असीम गहराईयों में दफ़्न हो जाएगा
इस बार भी सागर
एक गहरी सांस लेकर रह जाएगा

देखो, सागर कभी रोता नहीं
वो दर्द-बयानी नहीं करता
दुख में घुटेगा पर सीमाबद्ध रहेगा
यही तो उसका तुमसे वायदा है

उसका वायदा कभी टूटता नहीं
उसका धीरज कभी छूटता नहीं
वो सागर है
सागर कभी डूबता नहीं

आज मन बहुत कष्ट में है

ललित कुमार द्वारा लिखित, 27 जुलाई 2012
आज मन बहुत कष्ट में है
इस मन में कुछ भी नहीं है
यहाँ तक कि ना वीराना है
और ना ही कोई सन्नाटा
आवाज़ो के साथ यहाँ से
सन्नाटा भी चला गया है
जो कुछ यहाँ हुआ करता था
अब वो कुछ भी यहाँ नहीं है

लेकिन…

इतने विराट खालीपन में भी
ना जाने ये कमबख़्त… दर्द
जाने ये दर्द कहाँ से उपजता है
किस तरह ये दर्द उदयशील है
जबकि सृष्टि सारी अस्त में है?
आज मन बहुत कष्ट में है

मेरी कलम

ललित कुमार द्वारा लिखित, 25 जुलाई 2012
बहुत दिन से मैंने कुछ नहीं लिखा… ज़िद थी कि इस बार लिखूंगा तो केवल खुशी में लिपटे शब्द… पर ऐसा हो ना सका… मैं ये भी नहीं कह सकता कि मुझे नहीं मालूम क्यों मेरी कलम ख़ुशनुमाई छोड़कर अंधेरी ऊबड़-खाबड़ राहों पर चलने लगती है… मैं ये नहीं कह सकता; क्योंकि जवाब मैं जानता हूँ…
आज अपनी क़लम को मैंने
बहुत सख़्त ताकीद की थी
बड़े दिनों बाद तुम्हें उठाया है
तो हुस्नो-माह की बातें लिखना
खुशनुमा दिन, उगते सूरज
चांदनी रात की बातें लिखना
जब चलो तो चलना केवल
मुहब्बत-ओ-वफ़ा की गलियों में
कल्पना के रस में डूब-डूब
हर्फ़ों के निशां बनाना कुछ ऐसे
जैसे कोई कविता लिखी हुई हो

मेरी हिदायत-ओ-ताक़ीद पर
कलम बस दो ही कदम चली
और फिर वही हुआ जो होता है
मेरी कोशिशों से मुँह मोड़कर
ख़ुशनुमा रास्तों को छोड़कर
कलम एक पगडंडी पर उतरी
दर्द के आवारा ग़ुबारों के बीच
दु:ख से सहमी-सी शाम में
अकेलेपन की कंटीली झाड़ियों से
घायल हो, अपने ही लहू में डूब-डूब
कलम आज फिर इक ग़मज़दा
ख़ामोश अफ़साना लिखने लगी है
जो कविता तो शायद नहीं है

मेरी रची रचनाएँ

ललित कुमार द्वारा लिखित, 17 जून 2006
मेरी रची रचनाएँ
अक्सर मुझसे पूछती हैं
कि ओ रचनाकार
तुम ये अन्याय क्यों करते हो?
व्यक्त करने में स्वंय को
जब तुम समर्थ नहीं
तो काव्य के नाम पर
हमें क्यों रचते हो?

कविता पर्याय है
भावना का
बलात जोड़े गये
शब्दों और तुकों से
कविता नहीं बनती
जल जैसा बहाव चाहिये
बर्फ़ के टुकडों से
सरिता नहीं बनती

भावनाओं को
उलझे हुए शब्दों में
पिरोने का तुम
अपराध क्यों करते हो?

काव्य के नाम पर
हमें क्यों रचते हो?

मेरी रची रचनाएँ
अक्सर मुझसे पूछती हैं…