हिन्दी कविताएँ »

ललित कुमार द्वारा लिखित, 05 अप्रैल 2012 ज़िन्दगी श्वेत श्याम हो गई है रंग मेहमानों की तरह जैसे सम्पन्न हो चुके समारोह से एक-एक कर विदा हो गए हों कांच … Read more

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ललित कुमार द्वारा लिखित, 16 मार्च 2006 हर तारे का एक तारा साथी गिन-गिन देखे हमनें तारे पूरब से पश्चिम तक सारे मिला नहीं पर कोई भी ऐसा हो ना … Read more

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ललित कुमार द्वारा लिखित, 14 मार्च 2012 दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं… तुम्हे तो तुम्हारी राह मालूम है वही राह जो पहले से मौजूद पक्की सड़कों से … Read more