मेरी रची रचनाएँ

ललित कुमार द्वारा लिखित, 17 जून 2006
मेरी रची रचनाएँ
अक्सर मुझसे पूछती हैं
कि ओ रचनाकार
तुम ये अन्याय क्यों करते हो?
व्यक्त करने में स्वंय को
जब तुम समर्थ नहीं
तो काव्य के नाम पर
हमें क्यों रचते हो?

कविता पर्याय है
भावना का
बलात जोड़े गये
शब्दों और तुकों से
कविता नहीं बनती
जल जैसा बहाव चाहिये
बर्फ़ के टुकडों से
सरिता नहीं बनती

भावनाओं को
उलझे हुए शब्दों में
पिरोने का तुम
अपराध क्यों करते हो?

काव्य के नाम पर
हमें क्यों रचते हो?

मेरी रची रचनाएँ
अक्सर मुझसे पूछती हैं…

इल्तिज़ा-ए-ज़र्रा

ललित कुमार द्वारा लिखित, 17 अप्रैल 2012
यह एक धूल के कण की दरख्वास्त है। अपने प्रिय के कदम चूमने कि जिस इच्छा को उसने उम्र भर अपने दिल में संजोया; आज उस इच्छा के पूरे होने के आसार दिखने लगे हैं… लेकिन… कुछ इच्छाएँ मन में दम तोड़ देने के लिए बनी होती हैं…
तुम बेवजह ख़ुद को परेशान ना करो

मैं का एक जो बेठिकाना ठहरा
हूँ मुझे तो उड़ जाना ठहरा
तुम्हारी राहें हुई हैं सुर्ख़ फ़ूलों से
खुश्बुओं का गलीचा हर बिछा हुआ है
परिंदे भी गाते हैं के उसूलों से
तेरे नाज़ुक पैरों में चुभने को नहीं आया मैं
बस इक हसरत थी तेरे पांव तले
शायद से छूट जाता मैं
जिस तरह संवरी है यां तकदीर फूलों की
वैसे ही आवारगी से रिश्ता तोड़ पाता मैं

काश कुछ मेरे बस में भी होता या रब
हवा ने ला पटका है यां अंगार के ऊपर
अब हांसिल नहीं होगा
पल ये मैंने पाया था, हाय उम्रें कई खोकर
मैं तेरी दुनिया-सा नहीं खूबसूरत हूँ
मुझे दुनिया से तुम्हारी मिटा देते हैं लोग
तेरे कदमों की चाहत है
मुझे मासूम-सी चाहत की सज़ा देते हैं लोग

लो फिर से आ रहा है झोंका हवा का गहरा
मैं गर्द का एक ज़र्रा जो बेठिकाना ठहरा
गिरफ़्तारे-सबा हूँ कि मुझे उड़ जाना ठहरा
दूर तुमसे ले जाएगी दुश्मन है ये हवा मेरी
है कर दो उम्मीद फिर जवां मेरी

बस इक नज़र देख लो चाहे पहचान ना करो
फिर तुम्हारी दुनिया से गुज़र जाऊंगा मैं
तुम बेवजह ही ख़ुद को परेशान ना करो

धूल
कण
हवा पर निर्भर
ढकी हुईं
दिशा
संगीत
पवित्र
हवा पर निर्भरता
कदम चूमने का अवसर
क्योंकि
सुंदर और पवित्र
विनती

कोमल मेरे हृदय द्वार

ललित कुमार द्वारा लिखित, 06 अप्रैल 2012
भीतर क्या है कोई ना जाने
आहत करना बस ये जग जाने

इनको रखता मैं सदा ही बंद
बाहर का जग मुझे नहीं पसंद

विकृत शरीर में सुंदरता बन
यहाँ अंदर रहता है मेरा मन

तुम आओ तो धीरे-से दस्तक देना
फिर हौले से लेना मुझे पुकार

कठोर काठ के बने नहीं हैं
हैं कोमल मेरे हृदय द्वार!

मेरा वजूद इक सराब है

ललित कुमार द्वारा लिखित, 06 अप्रैल 2012
मृगतष्णा (सराब) अपने आप में एक अनोखी चीज़ होती है। मजबूर… अपने अस्तित्व से अनजान… उसमें आकर्षण है –लेकिन उससे किसी की प्यास नहीं बुझती… मृगतृष्णा मजबूर है… मृगतृष्णा एकाकी है…
मेरा वजूद
इक है

मुझे देख राहें ना बदल अपनी
देख, तू भी प्यासा रह जाएगा

वक्त की से
आज तलक
मैं प्यासा रहा हूँ
और तक
यूं ही प्यासा रहूंगा
फिर भी दामन में
इक उम्मीद बसाए रहता हूँ
कि आए कोई प्यासा
और मुझसे वो हांसिल करे
जो मुझमें दिखता है
जिससे मेरी भी प्यास बुझ सके
और उसकी भी रूह को
सुकून आए

प्यासे तो बहुत आए, बहुत गए
पर मुझको ना कोई पा सका
कोई कहता है कि मैं होता हूँ
लेकिन नहीं हूँ
कोई कहता है कि मैं नहीं हूँ
लेकिन होता ज़रूर हूँ
हैरत तो ये है कि
मैं ख़ुद भी नहीं जानता
मैं हूँ या नहीं हूँ!

मेरी
ना क़दम बढ़ा मुसाफ़िर
वरना तू भी मेरी तरह
बन के इक तमाशा रह जाएगा

मुझे देख राहें ना बदल अपनी
देख, तू भी प्यासा रह जाएगा

मेरा वजूद
इक सराब है

मृगतृष्णा
शुरुआत
अंत
तरफ़

हृदय का प्याला

ललित कुमार द्वारा लिखित, 05 अप्रैल 2012
अहसास पुराना है… शब्द अब दे पाया हूँ…
हृदय का प्याला जब टूटा
तो आँखों से छलका

का दर्द निकल पलकों से
बूंद बूंद बन के ढलका

जब तुमने नहीं समझा तो फिर
मोल समझे कौन इस खारे जल का

आंसुओं से कठोर नियती गलती नहीं
पर रो कर जिया हुआ कुछ तो हल्का

कल जब तुमने संग छोड दिया
अब कहाँ ठिकाना मेरे कल का

सीना