Category Archives: ग़नुक (ग़ज़ल-नुमा-कविता)

जीवन फूलों की सेज नहीं

ललित कुमार द्वारा लिखित, 12 अक्तूबर 2012
एक नई कविता। यह ग़नुक (ग़ज़ल नुमा कविता) नहीं है क्योंकि इसमें मतला अनुपस्थित है…
कैसे सपना उतरे आंखो में
जब नींद ही किरचें बोती है

जीवन फूलों की सेज नहीं
कांटो की कठिन चुनौती है

तम की खातिर पास मेरे
मुठ्ठी भर बस ज्योती है

तार तार तर दामन यूं ही
बरखा भी क्यूं भिगोती है

जहाँ कहीं से गुज़रुंगा मैं
वो खड़ी वहीं पर होती है

जिसे देख के मैं लिखता हूँ
पिए चांदनी वो सोती है

कहार पालकी के

ललित कुमार द्वारा लिखित, 26 फ़रवरी 2012 सायं 10:15
दस मिनट में लिखी एक ग़नुक (ग़ज़ल-नुमा कविता)
बस उसके लिए हुए, हम कहार पालकी के
आगे बहुत हैं देख लो, बाज़ार पालकी के

बाबुल को फिर से देख लूं, ओ मेरे कहार
सुन खोल दे ज़रा, ये द्वार पालकी के

फ़क़त मज़दूर नहीं, हम भी हैं
दुल्हन लिए आते हैं हम कहार पालकी के

ग़ुरूर, हया, दर्द-ओ-ग़म से लिपटे देखे हैं
होते हैं शख्स, सवार पालकी के

पहली दफ़ा गए हैं, वो जुआघर की ओर
बस कि दिन रह गए, दो-चार पालकी के

थे मगर, फिर दौलत पा गए
तब से हुए हैं बेबस, बीमार पालकी के

तेरे कदम फिर जाने, कब लौट के आएं
सोलह किए हैं हमने, सिंगार पालकी के

कोई , को लग गई
अर्सा गुज़रा नहीं हुए, दीदार पालकी के

रक्षक
भिन्न, अलग-अलग तरह के
सेहतमंद, स्वस्थ
बुरी नज़र
कोमल शरीर

हम ना होंगे

ललित कुमार द्वारा लिखित; 29 दिसम्बर 2004
एक बहुत पुरानी कविता…
क्या अंतर पड़ जाएगा, क्या कमी हो जाएगी
हम ना होंगे, ये कोयल गीत फिर भी गाएगी

रंगो का आंचल ओढ़े, फूल फिर भी खिला करेंगे
हम ना होंगे, ये तितलियाँ इसी तरह मंडरांएगी

हर सांझ ढले अंबर, तारक मणियों का थाल बनेगा
हम ना होंगे, भोर ऐसे ही किरनें नई फैलाएगी

संसार यूँ ही गतिमान रहेगा, किन्तु लगता है
हम ना होंगे, कीमत प्रेम की तब ही समझी जाएगी

कल जाने क्या होगा, इस बेक़रारी में नए हैं

ललित कुमार द्वारा लिखित; 31 जनवरी 2007 को 3:00 सायं
एक ग़नुक (ग़ज़ल-नुमा-कविता)…
कल जाने क्या होगा, इस बेक़रारी में नए हैं
साथ में रहना हम, दुनिया तुम्हारी में नए हैं

यहाँ बस नाम, दौलत, शोहरत की कीमत है
बहुत देर से जाना, हम दुनियादारी में नए हैं

एक ग़रीब कुचला गया, आस्मां तो नहीं टूटा
देखते नहीं साहब, अपनी सवारी में नए हैं

आकर ख़ुशी की शक्ल में, प्यार दर्द ही देता है
ये नहीं जानते वो जो, दोस्ती-यारी में नए हैं

वक़्त बेवक़्त जाने, क्यों भर आती हैं ये आंखे
पूछो मत हम तो, इस में नए हैं

खारा पानी

सोचता हूँ उस रोज़ इक ग़ज़ल लिखूँ

ललित कुमार द्वारा लिखित; 02 जून 2006
एक ग़नुक (ग़ज़ल-नुमा-कविता)…
सोचता हूँ उस रोज़ इक ग़ज़ल लिखूँ
जब मैं ज़िन्दगी को लिखूँ

तुम कहती तो हो दुनिया बड़ी हसीन है
इन दुखों को किस बहार की फ़सल लिखूँ

यारों को हाले-दिल लिखा तो ये हुआ
अब नाम भी अपना संभल संभल लिखूँ

कैसा नादान हूँ छोटे से घर में बैठ के मैं
ख़त पर जगह पते की उसका महल लिखूँ

ज़िन्दगी ग़मज़दा ही सही पर मिली तो है
इसके लिये मैं सबसे पहले उसका लिखूँ

मौत के नाम
कृपा