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	<title>दशमलव</title>
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	<description>अपूर्ण को पूर्ण करने के लिए</description>
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		<title>दशक का सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉगर!</title>
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		<pubDate>Wed, 16 May 2012 13:15:09 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Lalit Kumar</dc:creator>
				<category><![CDATA[विविध]]></category>

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		<description><![CDATA[दशक के सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉगर के चुनाव हेतु वोट करने के लिए मेरे पास एक ईमेल आया। मुझे मालूम था कि मैं वोट करने का इच्छुक नहीं हूँ (क्योंकि इन &#8230; <a href="http://lalitkumar.in/hindi/1179">Read more</a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://lalitkumar.in/hindi/wp-content/uploads/2012/05/hands-keyboard.jpg" alt="" title="hands-keyboard" width="240" height="180" class="alignleft size-full wp-image-1180" />दशक के सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉगर के चुनाव हेतु वोट करने के लिए मेरे पास एक ईमेल आया। मुझे मालूम था कि मैं वोट करने का इच्छुक नहीं हूँ (क्योंकि इन प्रक्रियाओं में मेरा भरोसा नहीं है) लेकिन उत्सुकतावश जाकर देखा कि वोटिंग हो कैसे रही है। वोटिंग की प्रक्रिया देखकर बड़ी हैरानी हुई कि दस ब्लॉगरों की एक लिस्ट पहले ही सामने जँचा दी गई है कि आप इन्हीं में से किसी एक को अपना वोट दें। चुनाव प्रक्रिया को “फ़्री एंड फ़ेयर” साबित करने के लचर प्रयास के चलते एक ग्यारहवां विकल्प ये दिया गया कि यदि आप इन दस के अलावा किसी अन्य को वोट देना चाहें तो उसका नाम बता दें। <strong>इस वोटिंग प्रक्रिया को डिज़ाइन करने वाले लोगों ने शायद कभी इसके बारे में कोई जानकारी अर्जित नहीं की कि इंसानों की मानसिकता और इंटरनेट पर उनका व्यवहार किस तरह से काम करता है।</strong> जिन दस ब्लॉग्स को सामने रखा गया है जीतेगा तो उन्हीं में से कोई एक क्योंकि इंटरनेट प्रयोक्ताओं के व्यवहार का अध्ययन करने वाले शोधार्थी भी मानते हैं कि इंटरनेट के प्रयोक्ता आलसी होते हैं। एक बटन दबाने की बजाए वे एक पूरा नाम टाइप करेंगे –इसकी संभावना बहुत कम है।</p>
<p>ये तो ख़ैर तकनीकी मसले हैं। प्रश्न यह भी है कि जिन दस ब्लॉग्स को चुना गया है –उन्हें चुनने के पीछे आधार क्या था। रवि रतलामी और अनूप शुक्ल जैसे नाम तो निर्विवाद रूप से सूची में शामिल होंगे&#8230; लेकिन बाकी आठ? उनका चुनाव कैसे हुआ? &#8230; <strong>सही कहूँ तो लिस्ट में एक-दो नाम ऐसे भी हैं जिन्हें आप ढंग से ब्लॉगर कह भी नहीं सकते।</strong> ये सही है कि अच्छे हिन्दी ब्लॉगर्स की संख्या कम ही है लेकिन यह संख्या दस से बहुत अधिक है। आप <a href="http://www.techwelkin.com/best-hindi-blogs.htm" target="_blank">टेकवेल्किन बेहतरीन ब्लॉग्स की लिस्ट</a> ही देख लें –इसमें कितने ही ऐसे ब्लॉग्स हैं जिन्हे वोटिंग के लिए सूची में होना चाहिए था। दस की जगह क्या सौ ब्लॉग्स की सूची वोटिंग के लिए सामने नहीं रखी जा सकती थी?</p>
<p><strong>ऐसा भी कुछ लोग ज़रूर सोचेंगे कि दशमलव का नाम सूची में ना होने के कारण मैं खिन्न हूँ।</strong> देखिए, आप मेरे पुराने लेख पढ़ेंगे तो पाएंगे कि मैंने कितनी ही जगह लिखा है कि मैं तो ख़ुद को ब्लॉगर नहीं मानता। मुझे हिन्दी ब्लॉगिंग के नाम से ही डर लगता है। मैं नए लोगों को हिन्दी ब्लॉगिंग सिखाता ज़रूर हूँ लेकिन अपने आपको हिन्दी ब्लॉगिंग की जमात के लिए क्वालीफ़ाइड नहीं कतई नहीं मानता। दशमलव को मैं अक्सर अपनी वेबसाइट कहता हूँ –इसे ब्लॉग का नाम देने में भी मुझे हिचक होती है। इसलिए ये सोचना कि दशमलव उस सूची में आने के किसी भी तरह से काबिल है –बड़ी मूर्खता होगी। और फिर दशमल को शुरु हुए जुम्मा-जुम्मा दो साल हुए हैं –बमुश्किल 150 लेख इस पर हैं –ऐसे में फ़िलहाल दशमलव उस सूची के लायक कतई नहीं है। लेकिन ये ज़रूर है कि मेरे विचार में उस सूची को और अधिक लम्बा होना चाहिए था और चुनाव का आधार स्पष्ट किया जाना चाहिए था। जिस तरह से इस पूरी प्रक्रिया को डिज़ाइन किया गया है उससे यह एक मज़ाक से अधिक कुछ नहीं लगती।</p>
<p><strong>यदि आपको वास्तव में दशक के सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉगर का चुनाव करना ही है</strong> तो इसके लिए सबसे अधिक उपयुक्त स्थान कोई ब्लॉग संकलक होगा –जहाँ रोज़ाना लोग जाते हैं&#8230; सूची में वर्णक्रमानुसार सौ ब्लॉग्स डालिए&#8230; सौ ब्लॉग्स कैसे चयनित हुए इसका आधार स्पष्ट कीजिए और वोटिंग को कम से कम छह महीने तक चलाइये&#8230; तब जाकर “दशक” और “सर्वश्रेष्ठ” जैसे शब्दों को कोई विश्वसनीयता मिल पाएगी।</p>
<p>मैंने स्वयं वोटिंग प्रक्रिया को टैस्ट नहीं किया है लेकिन यदि यह गूगल डॉक्स पर आधारित है तो इसमें बोगस वोटिंग संभव है। इस पर यदि यह कहा जाए कि आज ऐसी कोई तकनीक नहीं है जो <strong>बोगस वोंटिग</strong> को रोक सके या उसे बहुत मुश्किल बना सके –तो मुझे आश्चर्य होगा। महत्त्वपूर्ण यह भी है कि जिस प्रक्रिया पर बोगस वोटिंग का साया मंडरा रहा हो –उस प्रक्रिया में टॉप पर आने वाला ब्लॉगर इस बात को कैसे सिद्ध करता फिरेगा कि उसने बोगस वोटिंग नहीं कराई?</p>
<p>इस तरह के कार्य अच्छे हैं और किए भी जाने चाहिए लेकिन जल्दबाज़ी में नहीं&#8230; योजना बनाना बेहद ज़रूरी है। हर संभावित समस्या का समाधान खोज लेने के बाद ही इस तरह के कार्य होने चाहिए। वरना इस तरह की कोशिशों की कोई विश्वसनीयता नहीं रह जाती।</p>
<p>जैसा कि मैंने कहा कि मैं तो हिन्दी ब्लॉगिंग के नाम से ही डरता हूँ –इसलिए अनूप शुक्ल द्वारा प्रकाशित एक लेख के बाद ही मैं हिम्मत जुटा पाया कि अपने विचार इस “वोटिंग” प्रक्रिया के बारे में सार्वजनिक कर सकूं। हिन्दी ब्लॉगिंग में विचारों को सकारात्मकता से कभी नहीं लिया जाता। <strong>ज़रा-सी आलोचना लोग बर्दाश्त नहीं कर पाते।</strong> ऐसे में सुरक्षित रास्ता तो यही लगता है कि “हिन्दी ब्लॉगिंग” नाम के इस कुंड में जो रहा है उसे उसके हाल पर छोड़ते हुए अपने लेखन मस्त रहें। “ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर” वाली बात का अनुसरण करते हुए अपने विचार अपने तक ही रखते हुए निर्विवाद विषयों पर लेखन किया जाए।</p>
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		<title>नेपाम हमले के बाद किम फ़ुक (प्रसिद्ध तस्वीर)</title>
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		<pubDate>Wed, 16 May 2012 11:41:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Lalit Kumar</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रसिद्ध तस्वीर]]></category>

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		<description><![CDATA[Writely Expressed पर मेरा मूल अंग्रेज़ी लेख नेपाम एक अत्यधिक ज्वलनशील पदार्थ होता है जिसे पैट्रोल इत्यादि के साथ मिलाकर युद्ध में आग लगाने के लिए प्रयोग किया जाता है। &#8230; <a href="http://lalitkumar.in/hindi/1172">Read more</a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong><a href="http://lalitkumar.in/blog/kim-phuc-after-napalm-strike-famous-photograph/" target="_blank">Writely Expressed पर मेरा मूल अंग्रेज़ी लेख</a></strong></p>
<p>नेपाम एक अत्यधिक ज्वलनशील पदार्थ होता है जिसे पैट्रोल इत्यादि के साथ मिलाकर युद्ध में आग लगाने के लिए प्रयोग किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने सन 1980 में नागरिकों पर नेपाम के प्रयोग को प्रतिबंधित कर दिया था; लेकिन इस तरह का कोई प्रतिबंध 8 जून 1972 को अस्तित्व में नहीं था। यही कारण है कि फ़ान थी किम फ़ुक नामक नौ बरस की एक वियतनामी बच्ची को <strong>दुनिया के सबसे भयानक दर्दों में से एक को अनुभव करना पड़ा।</strong></p>
<div id="attachment_1173" class="wp-caption aligncenter" style="width: 617px"><img class="size-full wp-image-1173" title="Phan Thi Kim Phuc" src="http://lalitkumar.in/hindi/wp-content/uploads/2012/05/Phan-Thi-Kim-Phuc.jpg" alt="" width="607" height="356" /><p class="wp-caption-text">नेपाम हमले के बाद किम फ़ुक। फ़ोटोग्राफ़र निक उट</p></div>
<p>वियतनाम युद्ध के दौरान 8 जून 1972 को वियतनामी वायुसेना ने दक्षिणी वियतनाम में स्थित ट्रांग बैंग नामक गांव पर एक नेपाम बम गिराया था। <strong>पलक झपकते ही पूरा गांव आग के तूफ़ान में घिर गया</strong> और किम फ़ुक अपने घर से निकलकर किसी सुरक्षित जगह की तलाश में भागने लगी। उसके कपड़ों में आग लग गई थी इसलिए किम ने स्वयं को जलने से बचाने के लिए अपने कपड़े फ़ाड़ डाले। जब किम सड़क पर रोती हुई दौड़ रही थी तब एसोसिएटेड प्रेस के फ़ोटोग्राफ़र निक उट ने वो तस्वीर ली जिसे आज मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ। तस्वीर लेने के बाद निक सभी बच्चों को सॉयगान के बार्स्की अस्पताल में ले गए जहाँ यह पाया गया कि किम इतनी बुरी तरह से जल चुकी है कि शायद वह जीवित ना बचे। लेकिन <strong>14 महीने अस्पताल में रहने और 17 ऑपरेशन के बाद किसी तरह किम की ज़िन्दगी बचा ली गई।</strong></p>
<p>तस्वीर में नौ साल की किम फ़ुक नग्न अवस्था में सड़क पर दौड़ती दिखाई दे रही हैं। तस्वीर में किम का बड़ा भाई फ़ान थान टैम (उम्र 12 वर्ष, बिल्कुल बाईं ओर); छोटा भाई फ़ान थान फ़ुओक (उम्र 5 वर्ष, बाईं तरफ़ पीछे की ओर देखते हुए) और दो चचेरे भाई बहन भी दिखाई दे रहे हैं।</p>
<p><strong>एसोसिएटेड प्रेस ने पहले इस तस्वीर को प्रकाशित करने से मना कर दिया क्योंकि इसमें किम फ़ुक बिना कपड़ों के दिखाई दे रही हैं।</strong> इसको याद करते हुए फ़ोटोग्राफ़र निक उट कहते हैं:</p>
<blockquote><p>एसोसिएटेड प्रेस के एक संपादक ने इस तस्वीर को छापने से मना कर दिया क्योंकि इसमें किम का अग्र भाग नग्न दिख रहा है। उस समय किसी भी उम्र के स्त्री या पुरुष की नग्न तस्वीरें छापना एसोसिएटेड प्रेस की नीति के खिलाफ़ था। तस्वीर में यदि अग्र भाग नग्न दिखता हो तो छपने की कोई संभावना ही नहीं रहती थी। &#8230; होर्स्ट ने एसोसिएटेड प्रेस के न्यू यॉर्क मुख्यालय में टेलेक्स के ज़रिए बात की और कहा कि इस तस्वीर को अपवाद के रूप में लिया जाना चाहिए; लेकिन ये ज़रूर किया जाए कि तस्वीर में से अकेले किम की तस्वीर को निकाल कर नहीं छापा जाए। न्यू यॉर्क में संपादकगणों ने सहमति जताई कि यह तस्वीर इसमें दिख रही नग्नता से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है।</p></blockquote>
<p>आखिरकार तस्वीर छप गई और इस तस्वीर के लिए <strong>निक उट को पुलित्ज़र पुरस्कार मिला।</strong> इस तस्वीर ने युद्ध की विभीषिका को दुनिया के सामने लाने में बड़ा योगदान दिया –जिसकी मदद से वियतनाम युद्ध समाप्ति की ओर अग्रसर हुआ।</p>
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		<title>नमक कानून तोड़ते हुए महात्मा गांधी (प्रसिद्ध तस्वीर)</title>
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		<pubDate>Tue, 15 May 2012 11:18:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Lalit Kumar</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रसिद्ध तस्वीर]]></category>

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		<description><![CDATA[Writely Expressed पर मेरा मूल अंग्रेज़ी लेख नमक एक अति महत्त्वपूर्ण चीज़ है। इसकी अधिकता स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है लेकिन हम इंसानों के लिए इस खनिज का &#8230; <a href="http://lalitkumar.in/hindi/1163">Read more</a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="attachment_1164" class="wp-caption alignleft" style="width: 306px"><img class="size-full wp-image-1164" title="Gandhi_at_Dandi_6_April_1930" src="http://lalitkumar.in/hindi/wp-content/uploads/2012/05/Gandhi_at_Dandi_6_April_1930.jpg" alt="" width="296" height="414" /><p class="wp-caption-text">यह तस्वीर 6 अप्रैल 1930 को सुबह साढ़े छह बजे ली गई थी</p></div>
<p><a href="http://lalitkumar.in/blog/mahatma-gandhi-breaking-the-salt-law-famous-photograph/" target="_blank"><strong>Writely Expressed पर मेरा मूल अंग्रेज़ी लेख</strong></a></p>
<p>नमक एक अति महत्त्वपूर्ण चीज़ है। इसकी अधिकता स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है लेकिन हम इंसानों के लिए इस खनिज का पर्याप्त मात्रा में सेवन महत्त्वपूर्ण है। <strong>जब मानव जाति शिकार पर निर्भर करती थी; उस समय तो हमें नमक कच्चें मांस से मिल जाता था</strong> लेकिन कृषि की शुरुआत के बाद से हमारे भोजन का अधिकांश हिस्सा पौधों से आने लगा। परिणामस्वरूप हमारा नमक सेवन कम हो गया और हम नमक के लिए अन्य साधनों पर निर्भर होते चले गए। प्राचीन काल से ही सरकारों ने नमक पर कई कारणो से कर भी लगाया:</p>
<p>1) नमक ऐसी चीज़ रही है जिसका प्रयोग हर कोई करता है –इसलिए नमक पर कर लगाने से सरकारों को लगी-बंधी आमदनी होती थी।</p>
<p>2) क्योंकि नमक इतनी महत्त्वपूर्ण चीज़ थी –इसलिए नमक पर कर लगा कर सरकारें अपनी ताकत और अधिकारों का प्रदर्शन भी किया करती थीं।</p>
<p>3) नमक अन्य चीज़ों को संरक्षित रखने के काम भी आता है –इससे इसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है।</p>
<p>लेकिन नमक पर अत्यधिक कर ने क्रांतियों को भी जन्म दिया है। <strong>फ़्रांसिसी क्रांति के पीछे नमक कर एक महत्त्वपूर्ण कारण था और ठीक ऐसा ही भारत पर <strong>अंग्रेज़ी </strong>शासन के दौरान हुआ।</strong> ब्रिटेन ने अपने देश में तो नमक कर को 1825 में ही समाप्त कर दिया था लेकिन भारत जैसे अपने उपनिवेशों में इसे जानबूझ कर जारी रखा। भारत एक उष्णकटिबंध प्रदेश है –इसलिए यहाँ जीवन के लिए नमक बेहद ज़रूरी है। अधिक गर्मी होने के कारण पसीने के साथ हमारे शरीर से काफ़ी नमक निकल जाता है। साथ ही, भारतीय अपेक्षाकृत कम मांस खाते हैं। इसलिए भारतीयों के लिए अपने खाने में नमक मिलाना केवल स्वाद का विषय ही नहीं बल्कि जीवन का प्रश्न है।</p>
<p>जब ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भारत पर कब्ज़ा किया तो उन्होनें नमक कर को बेतहाशा बढ़ा दिया। सन 1858 में ब्रिटेन के क्राउन ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से भारत की कमान छीन कर अपने हाथों में ले ली –लेकिन नमक कर फिर भी नहीं हटाया। <strong>भारतीय जनता पर नमक कर का बोझ बहुत भारी पड़ रहा था और नमक एक तरह से विलासिता की चीज़ बन कर रह गया था।</strong> सन 1930 में महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा के प्रतीक के रूप में नमक कानून को तोड़ने का निर्णय किया। अंग्रेज़ों के बनाए इस कानून के तहत ना केवल नमक बनाना ग़ैर-कानूनी था; बल्कि प्राकृतिक रूप से उपलब्ध खुले में पड़े नमक को इकठ्ठा करना भी जुर्म था।</p>
<p>12 मार्च 1930 को गांधी जी ने अपने 78 अनुयायियों के साथ साबरमति आश्रम से एक पदयात्रा आरम्भ की। इस पदयात्रा का लक्ष्य अरब सागर के किनारे स्थित डांडी नामक जगह पर पहुँच कर नमक कानून तोड़ना था। हर दिन करीब 10-15 मील चलते हुए गांधी जी 24 दिन के बाद डांडी पहुँचे। 240 मील लंबी इस पदयात्रा के दौरान गांधी जी के साथ हज़ारों लोग जुड़ते चले गए। 5 अप्रैल 1930 को जब डांडी यात्रा समाप्त हुई; तब तक गांधी जी के साथ 50,000 से भी अधिक लोगों का हुजूम जुड़ चुका था।</p>
<p><strong>आज जो तस्वीर मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ उसमें महात्मा गांधी डांडी के समुद्र तट पर नमक से भरी मिट्टी उठाते दिख रहे हैं।</strong> यह तस्वीर 6 अप्रैल 1930 की सुबह साढ़े छह बजे ली गई थी। गांधी जी ने नमक भरी मिट्टी उठाते हुए कहा था “इसके साथ ही मैं ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें हिला रहा हूँ”&#8230; इसके बाद उन्होनें समुद्र के पानी को उबाल कर ग़ैर-कानूनी रूप से नमक बनाया और नमक कानून को तोड़ा। महात्मा गांधी का यह कार्य भारत में ब्रिटिश राज के लिए एक भारी आघात साबित हुआ।</p>
<p><strong>क्या आप जानते हैं?</strong></p>
<ul>
<li>महात्मा गांधी द्वारा डांडी में बनाया गया <strong>एक चुटकी नमक नीलामी के दौरान 1600 रुपए में बिका था।</strong> उस समय 1600 रुपए एक बहुत बड़ी धनराशी हुआ करती थी।</li>
<li>डांडी यात्रा को नमक सत्याग्रह और नमक यात्रा के नाम से भी जाना जाता है।</li>
<li>गांधी जी समुद्र के किनारे आगे बढ़ते गए और उन्होनें जगह-जगह नमक बनाया। अंतत: 4 और 5 मई 1930 की आधी रात को उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया।</li>
<li>नमक सत्याग्रह में भाग लेने वाले करीब <strong>80,000 लोगों को देश के विभिन्न हिस्सों में गिरफ़्तार किया गया।</strong></li>
<li>डांडी यात्रा हालांकि नमक कर नहीं हटवा पाई लेकिन इस घटना ने भारत की स्वतंत्रता के प्रति ब्रिटेन और विश्व के रवैये में बड़ा बदलाव किया। इसके बाद से भारत की स्वतंत्रता एक स्वप्न की बजाए एक हकीकत की तरह से दिखने लगी थी।</li>
</ul>
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		<title>स्कूल में वापसी</title>
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		<pubDate>Tue, 15 May 2012 06:59:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Lalit Kumar</dc:creator>
				<category><![CDATA[विविध]]></category>

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		<description><![CDATA[कुछ ही देर पहले गुड़गांव के एक स्कूल में बच्चों को व्यक्तित्व निर्माण और हिन्दी भाषा के महत्त्व के बारे में एक वक्तव्य देकर लौटा हूँ। मुझे जब भी स्कूलों &#8230; <a href="http://lalitkumar.in/hindi/1159">Read more</a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-full wp-image-1160" title="student-assembly" src="http://lalitkumar.in/hindi/wp-content/uploads/2012/05/student-assembly.jpg" alt="" width="224" height="129" />कुछ ही देर पहले गुड़गांव के एक स्कूल में बच्चों को <strong>व्यक्तित्व निर्माण और हिन्दी भाषा के महत्त्व</strong> के बारे में एक वक्तव्य देकर लौटा हूँ। <strong>मुझे जब भी स्कूलों से इस तरह के निमंत्रण मिलते हैं तो मैं कभी मना नहीं करता</strong> क्योंकि बच्चों के साथ बातें करना, उनकी समस्याओं को समझना और उन्हें कुछ महत्त्वपूर्ण कर गुज़रने के लिए प्रेरित करना मुझे अच्छा लगता है। अच्छा लगता है वापस स्कूल में जाना और उन दिनों को याद करना जब मैं स्वयं स्कूल में पढ़ता था। जिन स्कूलों में मैं पढ़ा हूँ वो इन स्कूलों से बिल्कुल अलग हैं जिनमें आज मुझे ससम्मान वक्ता के रूप में आमंत्रित किया जाता है। मेरे स्कूलों में बैठने के लिए टाट पट्टी भी उपलब्ध नहीं थी। बैसाखियों पर चलकर मुझे एक किलोमीटर दूर जाना होता था। गर्मी में पंखा तक नहीं होता था –पीने के लिए साफ़ पानी नहीं था –टॉयलेट ऐसे थे जो छह महीने में एक बार साफ़ किए जाते थे। अब जिन स्कूलों में मैं जाता हूँ वहाँ ए.सी. बस, ए.सी. क्लासरूम, कम्प्यूटर लैब, बैठने के लिए साफ़-सुथरे कुर्सी-मेज़, पीने के लिए फ़िल्टर का पानी&#8230; तमाम किस्म की सुविधाएँ वहाँ उपलब्ध हैं। अच्छा लगता है ये देखना कि बच्चों को ठीक से पढ़ाई कर सकने के लिए इतना अच्छा वातावरण मिलता है।</p>
<p><strong>मुझे हालांकि इस बात का खेद ज़रूर है कि जिन स्कूलों में मैं स्वयं पढ़ा हूँ</strong> –उन स्कूलों की ओर से मुझे अभी तक कोई आमंत्रण नहीं मिला। इससे पता चलता है कि वे स्कूल अभी तक बेहतरी की ओर अग्रसर नहीं हुए हैं। वहाँ बाहर से वक्ताओं को बुलाकर उनका परिचय बच्चों से कराने का चलन कभी भी नहीं रहा –और आज भी नहीं है। वहाँ पढ़ाने वाले मास्टर जी अभी भी इस बात को नहीं समझे हैं कि बच्चों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहन और आदर्शों की ज़रूरत होती है।</p>
<p>आज मुझे एक बहुत अच्छे प्रोजेक्ट के लिए कानपुर जाना था। वहाँ आई.आई.टी. कानपुर में विद्यार्थियों का एक समूह दो महीनों के लिए 45 रोचक प्रोजेक्ट्स पर काम करने के लिए जुट रहा है। इन प्रोजेक्ट्स, विद्यार्थियों और प्रोफ़ेसरों के बीच ताल-मेल बिठाने के काम के लिए रक्षक फ़ाउंडेशन ने मुझे आमंत्रित किया था। मुझे बहुत दुख है कि मैं इस काम को करने के लिए अभी कानपुर नहीं जा सकता। हाल में हुई अस्वस्थता से मैं अभी भी पूरी तरह नहीं उबर सका हूँ। <strong>प्रतिभावान नवयुवकों के बीच बैठ उनके प्रोजेक्ट्स पूरे करने में उन्हें मदद देकर बड़ा मज़ा आता।</strong> लेकिन ऐसा हो ना सका&#8230; मुझे करीब एक सप्ताह और चाहिए अपने को पूर्ण स्वस्थ घोषित करने के लिए।</p>
<p>बहरहाल, स्कूल से वापस आकर मैं आनंदित अनुभव कर रहा हूँ। कुछ बच्चों से मेरी व्यक्तिगत रूप से भी बातचीत हुई। उनके उत्साह को देखकर अच्छा लगा –और महसूस हुआ कि विद्यार्थियों को यदि उचित मार्गदर्शन, आदर्श और प्रोत्साहन मिले तो वे जीवन में लीक से हटकर भी कुछ करने के इच्छुक हैं। <strong>अब ज़िम्मेदारी शिक्षकों पर है</strong> कि वे विद्यार्थियों के समक्ष आदर्श रखें –उन्हें प्रेरित करें –उनका मार्गदर्शन करें –उन्हें प्रोत्साहित करें।</p>
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		<title>कविता कोश का नया सर्वर</title>
		<link>http://lalitkumar.in/hindi/1146</link>
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		<pubDate>Mon, 14 May 2012 04:52:09 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Lalit Kumar</dc:creator>
				<category><![CDATA[कविता कोश]]></category>

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		<description><![CDATA[पिछले एक साल के दौरान कविता कोश सर्वर का बंद हो जाना और फिर मेरे पास लोगों के संदेशो की बाढ़ –अब मेरे लिए ये चीज़े नई नहीं रह गई &#8230; <a href="http://lalitkumar.in/hindi/1146">Read more</a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="attachment_1147" class="wp-caption alignleft" style="width: 220px"><img class="size-full wp-image-1147" title="kk-server" src="http://lalitkumar.in/hindi/wp-content/uploads/2012/05/kk-server.jpg" alt="" width="210" height="210" /><p class="wp-caption-text">कविता कोश और सर्वर का मसला</p></div>
<p>पिछले एक साल के दौरान कविता कोश सर्वर का बंद हो जाना और फिर मेरे पास लोगों के संदेशो की बाढ़ –अब मेरे लिए ये चीज़े नई नहीं रह गई हैं। कुछ दिन पहले कविता कोश करीब दस दिन इसलिए बंद रहा क्योंकि सर्वर ओवरलोड के कारण बंद हो गया और मैं बीमार चल रहा था। इसलिए सर्वर को ठीक करने के लिए कुछ नहीं कर सका। बीमारी से उबरने के बाद जब सर्वर को किसी तरह ठीक किया तो 2-3 दिन चलने के बाद अब सर्वर फिर से बंद हो गया है।</p>
<p>जैसा कि मैं पहले भी कई बार बता चुका हूँ कि कविता कोश का सर्वर ओवरलोड के कारण बंद होता है। कोश की लोकप्रियता ही इसे नहीं चलने दे रही। <strong>एक साथ इतने अधिक लोग कविता कोश देखने की कोशिश करते हैं कि मौजूदा सर्वर उस लोड को झेल नहीं पाता और बंद हो जाता है।</strong></p>
<p>कविता कोश हिन्दी की अव्यवसायिक रूप से चलने वाली सबसे बड़ी वेबसाइट है। कविता जैसे अति-विशेष विषय पर आधारित होने के बावज़ूद यह एक काफ़ी व्यस्त वेबसाइट है। आज सुबह ही मैंने कई अन्य बड़ी अव्यवसायिक हिन्दी वेबसाइट्स के साथ कविता कोश की तुलना की तो पाया कि अन्य वेबसाइट्स ट्रैफ़िक के मामले में कविता कोश के आस-पास भी नहीं हैं।</p>
<p>इतनी व्यस्त वेबसाइट के लिए अभी तक जो सर्वर प्रयोग होता रहा है वैसा सर्वर केवल एक सामान्य से ब्लॉग के लिए ही उचित रहता है। कविता कोश जैसी बड़ी वेबसाइट को वस्तुत: अपना अलग सर्वर चाहिए। किन्तु कविता कोश के पास इस तरह का सर्वर लेने के लिए धन उपलब्ध नहीं है।</p>
<p><a href="http://lalitya.in/donate" target="_blank">लालित्य इंटरनेशनल</a> के गठन के बाद <strong>कुछ सज्जनों ने हिन्दी व कविता कोश के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए</strong> यथासंभव धनराशी उपलब्ध कराई है –लेकिन यह धनराशी कविता कोश के सर्वांगीण विकास के लिए बहुत कम है।</p>
<p>अब मैंने निर्णय लिया है कि कविता कोश के सर्वर को बदलना ही होगा। मैं आज से ही इस प्रक्रिया को शुरु कर रहा हूँ। मैं सीधे Dedicated Server नहीं ले रहा हूँ –बल्कि पहले मैं कोश को Virtual Private Server (VPS) पर चलाने की कोशिश करूंगा। यदि VPS पर भी बात नहीं बनी तो हो सकता है हमें Dedicated Server भी लेना पड़े। <strong>जिस तरह का VPS कविता कोश को चाहिए उसका मासिक किराया करीब 6,000 रुपए होगा।</strong> अभी तक मैं सर्वर को बदलने के बारे में केवल सोचता ही रहा हूँ लेकिन धन की कमी ने ऐसा कभी होने नहीं दिया। लालित्य इंटरनेशनल के पास फ़िलहाल जितनी धनराशी है उससे कुछ महीनों तक कविता कोश के VPS  का खर्च उठाया जा सकता है। VPS की कीमत का भुगतान मासिक रूप से किया जाएगा। इसका आशय यह है कि अब से <strong>कविता कोश केवल उस महीने तक उपलब्ध रहेगा जब तक लालित्य इंटरनेशनल के पास सर्वर का खर्च चुकाने के पैसे होंगे।</strong> पैसे खत्म होने की स्थिति में सर्वर अपने आप बंद हो जाएगा।</p>
<p><strong>कविता कोश आने वाले कुछ और दिन बंद रहेगा</strong> क्योंकि लालित्य इंटरनेशनल के पास अपना क्रेडिट कार्ड नहीं है –इसलिए अमेरिका मे स्थित सर्वर कम्पनी को मासिक भुगतान करने का तरीका निकालने में मुझे कुछ समय लग सकता है। भुगतान होने के बाद पूरे कोश को नए सर्वर पर स्थानांतरित किया जाएगा –इस तरह के स्थानांतरण के दौरान वेबसाइट के कोड में अक्सर समस्याएँ आ जाती हैं –मुझे एक-एक कर इन सभी समस्याओं को दूर करना होगा। इसके बाद ही कविता कोश आप लोगों को उपलब्ध हो पाएगा।</p>
<p>कविता कोश जैसी अमूल्य निधि के प्रति सक्षम पाठकों और संस्थानों की उदासीनता का ही परिणाम है कि राष्ट्रीय महत्तव के इस स्रोत को आज अपने विकास को तो छोड़िए –बल्कि अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है।</p>
<p>चूंकि दशमलव मेरा व्यक्तिगत ब्लॉग है और इस पर मुझे अपने विचार लिखने का अधिकार है तो मैं ईमानदारी से कह सकता हूँ कि कई बार&#8230; कई बार मुझे ऐसा लगता है कि हिन्दी भाषी समाज कविता कोश जैसी परियोजनाओं के लायक ही नहीं है। <strong>यही परियोजना यदि अंग्रेज़ी या फ़्रेंच जैसी भाषाओं के काव्य को लेकर बनी होती तो आज इसे अपने अस्तित्व के लिए लोगों का मुँह ना तकना पड़ता।</strong> हमारा हिन्दी भाषी समाज अपनी अंदरूनी उहापोह का इस कदर शिकार है कि उसे नया कुछ नहीं सूझता। हिन्दी भाषी समाज में कुछ विशाल कर गुज़रने की इच्छाशक्ति का अभाव स्पष्ट झलकता है।</p>
<p>सर्वर बंद होने पर जो संदेशे मुझे मिलते हैं –उनमें से कई की भाषा आरोप लगाने वाली होती है। हमारा हिन्दी भाषी समाज आज तक यह भी नहीं समझ पाया कि कविता कोश कुछ मुठ्ठी भर लोगों की <strong>स्वैच्छिक</strong> मेहनत का परिणाम है। कविता कोश को प्रयोग करने वाले इसके लिए एक पैसा भी नहीं देते –फिर ऐसे में <strong>“आपका सर्वर तो अक्सर बंद ही पाया जाता है”</strong> जैसी भाषा प्रयोग करने का जनसामान्य को कोई अधिकार नहीं है। इस तरह की भाषा वे अज्ञानी लोग प्रयोग करते हैं जिन्होंने कविता कोश को केवल जीमेल की तरह मुफ़्त में प्रयोग करना सीखा है। लेकिन जीमेल मुफ़्त नहीं है बल्कि एक व्यवसायिक उत्पाद है (गूगल विज्ञापनों के ज़रिए पैसे कमाता है और जीमेल के विकास में लगाता है)</p>
<p>बहरहाल, कविता कोश का सर्वर आने वाले कुछ दिन में बदल दिया जाएगा –लेकिन तब तक कोश बंद ही रहेगा। यदि हिन्दी संस्थान और सक्षम व्यक्ति कविता कोश को आर्थिक सहायता नहीं देते हैं –तो कविता कोश उद्योग जगत से सहायता लेने की कोशिश भी करेगा। अभी तक हमनें कविता कोश को विज्ञापनों से मुक्त रखा है –लेकिन यदि स्थिति नहीं बदली तो हो सकता है जल्द ही आपको कोश की साइट पर स्पॉन्सरशिप के विज्ञापन देखने को मिलें। केवल इसलिए कि हिन्दी भाषी समाज की अपनी निधियाँ संभाल कर रखने में रुचि नहीं है –मैं कविता कोश के योगदानकर्ताओं की मेहनत को व्यर्थ नहीं कर सकता।</p>
<p>करोड़ों रुपयों के सरकारी बजट से लबरेज़ हिन्दी संस्थानों का खोखलापन हमनें देख लिया है। <strong>अब हमें इस बात से कोई गुरेज़ नहीं रहा है कि कोई टाटा, अम्बानी या कोई भी अन्य उद्योगपति आए, कविता कोश के विकास के लिए आर्थिक सहायता दे और अपना लोगो कविता कोश के लोगो के साथ स्पॉन्सर के रूप में लगा दे।</strong></p>
<p>जैसे ही कविता कोश का सर्वर फिर से आरम्भ होगा –हम आर्थिक सहायता देने वाले सभी सज्जनों के नाम कविता कोश की वेबसाइट पर दिखाएंगे। इनमें से कुछ लोग अपने द्वारा दी गई सहायत को गुप्त रखना चाहते हैं –उनकी इच्छा का मान रखते हुए उनके नाम “अनाम” रखे जाएंगे।</p>
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		<title>स्टोन बॉय और डोडो के देश से – भाग 2</title>
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		<pubDate>Sun, 29 Apr 2012 05:44:29 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Lalit Kumar</dc:creator>
				<category><![CDATA[विविध]]></category>

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		<description><![CDATA[आज सुबह मैं मॉरीशस से दिल्ली लौट आया। सुबह साढ़े तीन बजे विमान दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरा; मैं पाँच बजे घर आ पहुँचा और आते &#8230; <a href="http://lalitkumar.in/hindi/1141">Read more</a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="attachment_1142" class="wp-caption alignleft" style="width: 189px"><img class="size-full wp-image-1142" title="mauritius-emblem" src="http://lalitkumar.in/hindi/wp-content/uploads/2012/04/mauritius-emblem.jpg" alt="" width="179" height="178" /><p class="wp-caption-text">मॉरीशस</p></div>
<p>आज सुबह मैं मॉरीशस से दिल्ली लौट आया। सुबह साढ़े तीन बजे विमान दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरा; मैं पाँच बजे घर आ पहुँचा और आते ही सो गया; शरीर में काफ़ी थकान थी क्योंकि मैं पिछले करीब चौबीस घंटे से बिना रुके यात्रा कर रहा था और अनेकों व्यक्तियों से मिल रहा था&#8230; सुबह साढ़े सात बजे नींद खुल भी गई। सूर्योदय के बाद मैं अधिक देर तक नहीं सो सकता।</p>
<p>आज जब से दिल्ली में आंखे खोली हैं; <strong>एक चीज़ जिसकी मुझे सबसे अधिक कमी खल रही है वो हैं “गुरुजी” कहकर पुकारने वाली आवाज़ें!</strong> जी हाँ! मॉरीशस में कार्यशाला के दौरान सभी प्रतिभागी मुझे गुरुजी कह कर बुलाते थे। मेरे मना करने के बावज़ूद किसी ने मेरी बात नहीं सुनी; फिर धीरे-धीरे मैंने समझा कि इस तरह का संबोधन मॉरीशस में शिक्षकों के लिए आम है। हिन्दी भाषी छात्र इसी तरह अपने शिक्षकों को संबोधित करते हैं!</p>
<p>इस स्थिति की जब मैं दिल्ली से तुलना करता हूँ तो अच्छा नहीं लगता। यहाँ “गुरु” शब्द के मायने, उसे बोलने का तरीका और प्रयोग करने के कारण –सब बिगड़ चुके हैं। गुरु शब्द जिस तरह से यहाँ बोला जाता है उसके शिक्षक होने का अर्थ कतई नहीं निकलता। “गुरु” या तो चालाक को कहा जाता है या आध्यात्मिक गुरुओं को। <strong>भारत में यह शब्द अब उस शिक्षक के लिए नहीं रहा है जो आपको भाषा, गणित, विज्ञान, समाजशास्त्र इत्यादि विषयों का ज्ञान देता है।</strong> मॉरीशस कार्यशाला में सबसे छोटा छात्र उन्नीस वर्ष का था और सबसे उम्रदराज सज्जन उन्यासी वर्ष के थे! इन प्रतिभागियों की उम्र चाहे जो भी रही हो पर जिस गंभीरता से ये अपनी भाषा और संस्कृति का ख्याल रख रहे हैं –उसे देखकर मुझे बहुत ही अच्छा लगा –लेकिन साथ ही दिल्ली की संस्कृति याद आने पर दुख भी हुआ। ये सभी प्रतिभागी गुरुजी, गुरुदेव, शुभप्रभात, शुभयात्रा, शुभरात्री जैसे अनेकों शब्दों का प्रयोग पूरी सहजता से करते थे। इन्हीं शब्दों को यदि दिल्ली में लोग बोलेंगे तो उस पर “शुद्ध हिन्दी” का ठप्पा लगाकर व्यक्ति और भाषा दोनों को मज़ाहिया तरीके से पेश किया जाएगा। कितने दुर्भाग्य की बात है।</p>
<p>मॉरीशस की कार्यशाला में “शुद्ध हिन्दी” जैसी कोई चीज़ मुझे देखने को नहीं मिली। दिखावा तो लेशमात्र को भी नहीं था। केवल सरलता, मिठास और भारत व हिन्दी के प्रति अगाध प्रेम से ओत-प्रोत लोग ही दिखाई पड़े। इसके लिए सभी प्रतिभागी और कार्यशाला से अलग जिन भी व्यक्तियों से मैं मिला; वे सभी बधाई के पात्र हैं।</p>
<p>यहाँ मैं उन चंद लोगों को धन्यवाद दिए बिना नहीं रह सकता –जिन्होंने नई पीढ़ी को अपनी भाषा व संस्कृति का मन से आदर करना सिखाया है। <strong>मैं सभी के नाम तो यहाँ नहीं ले पाऊँगा लेकिन गुलशन, विनय और अरविंद नामक तीन व्यक्तित्वों का ज़िक्र ज़रूर करूंगा।</strong> कार्यशाला की लगातार चल रही व्यस्तता के कारण मैं इन तीनों के साथ उतना समय नहीं बिता सका जितना मैं चाहता था। तीनों ही कमाल के व्यक्ति हैं&#8230; युवा हैं, कर्मठ हैं, प्रतिभा से लबालब हैं और देश, भाषा व संस्कृति के लिए कुछ अच्छा कर गुज़रनी की इच्छा इनके मन में समाई है। तीनों ही से मिलकर मुझे ऐसा लगा जैसे मैं स्वयं से ही मिल रहा हूँ। इन तीनों के चेहरों को प्रकृति ने स्वभाविक मुस्कान बख्शी है और ये लोग इस अमूल्य उपहार का प्रतिपल उपयोग करते दिखते हैं। एक समूह के रूप में कार्य करना, घनिष्ठ मित्रता और विश्वास को जीवन का आधार बनाना इनके स्वभाव का हिस्सा है। इस त्रिमूर्ति के दर्शन जल्द ही फिर से हों ऐसी मेरी कामना है। इन तीनों समेत मॉरीशस के सभी मीठे लोगों के लिए मेरे मन में इब्न-इ-इंशा की निम्नलिखित पंक्तियाँ आ रही हैं:</p>
<p><strong>सीधे मन को आन दबोचें, मीठी बातें सुन्दर लोग</strong><br />
<strong>मीर, नज़ीर, कबीर, और इन्शा सबका एक घराना हो</strong></p>
<p>मॉरीशस में बिताए एक सप्ताह में कार्यशाला की मसरूफ़ियत के कारण मैं नियमित और सिलसिलेवार लेखन तो नहीं कर पाया लेकिन फिर भी काफ़ी कुछ लिखा है। इस सामग्री को मैं आज से आपके समक्ष लाने का प्रयास करूंगा –ताकि मॉरीशस की अपनी पहली यात्रा की महकती यादें अपने पाठकों के साथ बांट सकूं।</p>
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		<title>स्टोन बॉय और डोडो के देश से &#8211; भाग 1</title>
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		<pubDate>Mon, 23 Apr 2012 19:34:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Lalit Kumar</dc:creator>
				<category><![CDATA[विविध]]></category>

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		<description><![CDATA[दिनांक: 22 अप्रैल 2012 मैं इस समय मॉरीशस के क्वात्र-बॉर्न शहर के होटल गोल्ड क्रेस्ट में हूँ। यहाँ शाम के नौ बजे हैं। अभी-अभी रात का भोजन करके लौटा हूँ। &#8230; <a href="http://lalitkumar.in/hindi/1134">Read more</a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दिनांक: 22 अप्रैल 2012</strong></p>
<p>मैं इस समय मॉरीशस के क्वात्र-बॉर्न शहर के होटल गोल्ड क्रेस्ट में हूँ। यहाँ शाम के नौ बजे हैं। अभी-अभी रात का भोजन करके लौटा हूँ। शरीर और दिमाग बुरी तरह से थके हुए हैं। कल सारी रात घर से एयरपोर्ट जाने और फिर फ्लाइट के दौरान बीत गई। आज का आधा दिन भी फ्लाइट में ही बीता। लम्बी हवाई यात्राएँ बोरिंग होती हैं –लेकिन एक बात अच्छी ये हुई कि मैंने विमान में समय बिताने के लिए आखिरकार “रॉकस्टार” फ़िल्म देख डाली। काफ़ी दिन से देखने के बारे में सोच रहा था –कई मित्र इसकी अनुशंसा भी कर चुके थे। फ़िल्म अच्छी लगी लेकिन नरगिस फ़ाकरी नहीं।</p>
<p>मैं मॉरीशस में विश्व हिन्दी सचिवालय द्वारा आयोजित एक दिन के सेमिनार में भाग लेने आया हूँ। कल इस सेमिनार में मुझे अपना एक शोध पत्र प्रस्तुत करना है। इसके बाद मैं श्रीमति पूर्णिमा वर्मन जी और बालेन्दु दधीच के साथ मिलकर चार दिन की एक कार्यशाला का संचालन करूंगा। इस कार्यशाला में हम मॉरीशस और अन्य देशों से आए प्रतिभागियों को इस बात का प्रशिक्षण देंगे कि वे किस तरह अपने-अपने कार्यक्षेत्र के संदर्भ में हिन्दी को कम्प्यूटर व इंटरनेट पर प्रयोग कर सकते हैं।</p>
<p>बहरहाल, मैं यहाँ मॉरीशस एयरपोर्ट पर आज दोपहर करीब 12:30 बजे पहुँचा। मॉरीशस देखने की इच्छा मेरे मन में तब से रही है जब से बचपन में मैंने दूरदर्शन पर “स्टोन बॉय” नामक एक धारावाहिक देखा था। अपने एक <a href="http://lalitkumar.in/hindi/1070" target="_blank">पुराने लेख</a> से सामग्री लेकर मैं आपको इस धारावाहिक के बारे में जानकारी दे रहा हूँ।</p>
<blockquote><p>बच्चों के लिए बने 10 किश्तों में प्रसारित हुए इस धारावाहिक के अंत ने असंख्य बच्चों को भावुक कर दिया था। मॉरीशस की एक लोक कथा पर आधारित इस धारावाहिक के प्रमुख किरदार दो बच्चे अजीत और अर्चना (अर्चू) थे। पिता का स्थानांतरण हो जाने के कारण पूरे परिवार को मॉरीशस जाना पड़ा और वहाँ दोनों बच्चों की मुलाकात स्टोन बॉय से हुई। बीते समय में स्टोन बॉय एक गरीब चरवाहा बच्चा था। एक बार उसने छुपकर परियों को धरती पर उतरते और नाचते-गाते देख लिया; परियों को इसकी खबर हो गई और उन्होने उस चरवाहे को पत्थर हो जाने का शाप दे दिया। बड़ी मिन्नत करने पर परियों को दया आ गई और उन्होनें कहा कि अब उसके गरीबी के दिन दूर हो जाएंगे। लेकिन जिस दिन वह परियों को देखने की बात किसी को भी बताएगा –उसी दिन वह पत्थर का हो जाएगा। परियों के शाप-मिश्रित-वरदान से चरवाहे के दिन फिर गए। उसकी समृद्धि देखकर गाँव वालों ने उस पर दबाव बनाना शुरु किया कि वह इस समृद्धि के पीछे का राज़ उन्हें बताए। एक दिन चरवाहा इस दबाव को बर्दाश्त नहीं कर पाया और उसने परियों का राज़ गाँव वालों को बता दिया। ऐसा करते ही चरवाहा पत्थर बन गया और उछल कर एक पहाड़ की चोटी पर जा टिका। परियों ने यह भी कहा था कि पत्थर बन जाने के बाद उसे पचास साल तक पत्थर ही बने रहना होगा। पचास साल के बाद यदि कोई उसे दिल से पुकारेगा तो वह तीन दिन के लिए जीवित हो जाएगा और तीन दिन के बाद फिर से पचास साल के लिए पत्थर बन जाएगा। अजीत और अर्चना की पुकार ने किस तरह स्टोन बॉय को तीन दिन के लिए जीवित किया –फिर तीन दिन तक इन तीनों बच्चों ने कैसे-कैसे मज़े किए और अंत में कैसे स्टोन बॉय फिर से पत्थर हो गया –इसी की कहानी था यह धारावाहिक।
</p></blockquote>
<p>बचपन में मन भोला होता है और उस पर छाप आसानी से पड़ जाती है। धारावाहिक देखते समय मैंने यह मान लिया था कि स्टोन बॉय एक वास्तविकता है और एक दिन मैं भी स्टोन बॉय को उसी तरह देख सकूंगा जैसे अजीत और अर्चना ने देखा था। उस समय मुझे ना तो यह पता था कि स्टोन बॉय केवल एक लोककथा है और ना ही मुझे इस बात से कोई मतलब था। मेरे लिए तो स्टोन बॉय एक सच्चाई बन गया था।</p>
<p>आज मॉरीशस में हवाई जहाज का दरवाज़ा खुलते ही मेरे नाम की घोषणा हुई कि मैं जहाज से निकलने के बाद ग्राउंड स्टाफ़ से सम्पर्क करूं। मुझे आश्चर्य हुआ कि ऐसा क्या हो गया है जिसके लिए घोषणा जहाज का दरवाज़ा खुलते ही की गई है! जहाज के दरवाज़े और जेटी से निकलते ही हवाई अड्डे की एक कर्मचारी मेरे नाम का एक बड़ा-सा कार्ड थामे हुई दिखाई दीं। परिचय देने पर उन्होंने बड़े आदर भाव के साथ मुझे हवाई अड्डे की वी.आई.पी. लांज में पहुँचाया। यह सब मेरे लिए अप्रत्याशित था; <strong>मैंने कई देशों की यात्रा अलग-अलग कारणों से की है लेकिन ऐसा वी.आई.पी. व्यवहार देखने का मैं बिल्कुल भी आदि नहीं था।</strong> लांज में मेरा सामान तक ला कर दिया गया, इमीग्रेशन की औपचारिकताएँ पूरी करने के लिए इमीग्रेशन अधिकारी स्वयं चलकर लांज में आए।</p>
<p>वी.आई.पी. लांज में एक आरामदायक जगह पर बैठ कर मैं कॉफ़ी पी रहा था। इस लांज में हवाई अड्डे की अन्य लांज की तरह मेहमानों की बहुत गहमा-गहमी नहीं थी (शायद इसीलिए यह वी.आई.पी. लांज थी) मैं इस लांज का जायजा ले ही रहा था कि एक महिला लांज में दाखिल हुईं। उन्होंने जींस के साथ सफ़ेद और लाल रंग की बड़ी-बड़ी पट्टियों वाली एक टी-शर्ट पहनी हुई थी। वे आईं और आराम से दूर के एक कोने में बैठ गईं। लांज के एक कर्मचारी ने उनका सामान्य अभिवादन किया। इसके अलावा किसी ने उनकी ओर देखा भी नहीं। मुझे बताया गया कि ये मॉरीशस की कार्यकारी राष्ट्रपति हैं! यह सुनकर मुझे बड़ा अचरज हुआ कि किसी देश की महामहिम राष्ट्रपति इतनी आराम से एक लांज में आ रही हैं। उनके साथ ना तो कोई सुरक्षा काफ़िला था और ना ही सुरक्षाकर्मी। ना ही आगे-पीछे भागते व्यक्तिगत स्टाफ़ के लोग। लांज के कर्मचारियों ने उनका स्वागत भी उसी तरह किया जैसे मेरा किया था। मैं तो इस देश में मेहमान हूँ शायद इसीलिए मेरे स्वागत में तो फिर भी पूरे लांज के कर्मचारी आ गए थे –लेकिन महामहिम राष्ट्रपति जी के प्रति उनका सामान्य व्यवहार देखकर मन बहुत प्रसन्न हुआ। यह सब देखकर मुझे सहज ही भारत की राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा पाटील और अमेरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की याद आ गई। कितना फ़र्क है ना! कुछ देर बाद एक बड़ी-सी कार में सीधे लांज से ही मुझे क्वात्र-बॉर्न लाया गया और होटल में ठहरा दिया गया। इतनी सुखद हवाई यात्रा मैंने आज तक नहीं की थी!</p>
<p>एयरपोर्ट से क्वात्र-बॉर्न शहर की ओर आते हुए मैंने&#8230;&#8230;. स्टोन बॉय को देखा!</p>
<div id="attachment_1135" class="wp-caption aligncenter" style="width: 632px"><img src="http://lalitkumar.in/hindi/wp-content/uploads/2012/04/stone-boy-mudia-pahad.jpg" alt="" title="stone boy mudia pahad" width="622" height="467" class="size-full wp-image-1135" /><p class="wp-caption-text">मॉरीशस आकर मैंने सबसे पहली तस्वीर स्टोन बॉय की ली। चित्र में दिख रही पहाड़ियों में सबसे दाहिनी ओर की पहाड़ी की चोटी पर रखी दिख रही चट्टान ही स्टोन बॉय है!</p></div>
<p>स्टोन बॉय पहाड़ी को यहाँ मुड़िया पहाड़ कहा जाता है। एक छोटी-सी चट्टान पहाड़ी की चोटी पर टिकी है। यही था स्टोन बॉय। इस पहाड़ी को देखते ही मन में बहुत से भाव एक साथ उमड़ पड़े। <strong>लगा जैसे एक बच्चे की मुराद पूरी हो गई हो।</strong> हालांकि बचपन का वह ज़माना बहुत पहले बीत चुका था.. मैं यह भी जान चुका था कि स्टोन बॉय केवल एक कहानी मात्र है&#8230; लेकिन फिर भी, आज स्टोन बॉय को देखकर एक अनजानी-सी संतुष्टि हुई।</p>
<p>मॉरीशस के लोगों का मधुर व्यवहार दिल को जीत लेने वाला है। शालीनता और शिष्टता यहाँ के लोगों के व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग जान पड़ती है। बहुत ही सुंदर देश है।</p>
<p><strong>संस्मरण जारी है&#8230;</strong></p>
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		<title>पहला चंडीगढ़ लिटरेचर फ़ेस्टिवल</title>
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		<pubDate>Mon, 16 Apr 2012 13:29:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Lalit Kumar</dc:creator>
				<category><![CDATA[विविध]]></category>

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		<description><![CDATA[कुछ महीने पहले मेरी मित्र शायदा ने बताया था कि वे चंडीगढ़ शहर में एक साहित्यिक गतिविधि करने जा रही हैं। उन्होनें मुझसे आग्रह किया कि मैं इस गतिविधि में &#8230; <a href="http://lalitkumar.in/hindi/1126">Read more</a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कुछ महीने पहले मेरी मित्र शायदा ने बताया था कि वे चंडीगढ़ शहर में एक साहित्यिक गतिविधि करने जा रही हैं। उन्होनें मुझसे आग्रह किया कि मैं इस गतिविधि में हिस्सा लूं। आप जानते ही हैं कि मित्रो की बात टालना मेरे लिए कितना मुश्किल है –सो मैंने कह दिया कि आप आयोजन कीजिए और कार्यक्रम तय होने के बाद मुझे जानकारी दें –मैं आ जाऊंगा।</p>
<p>इस महीने की शुरुआत में शायदा ने फिर एक संदेश भेजा और सूचना दी कि अदब फ़ाउंडेशन नामक एक नवनिर्मित संस्था चंडीगढ़ शहर में पहला साहित्यिक मेला (लिटरेचर फ़ेस्टिवल) आयोजित करने जा रही है। शायदा भी इस ग़ैर सरकारी संस्था से संबंधित हैं और उनके आदेश पर मैं पहुँच गया चंडीगढ़। कार में बैठ कर दिल्ली से चंडीगढ़ जाना थका देने वाला था –लेकिन मौसम की मेहरबानी रही और ठंडी हवाओं ने थकान को सीमित ही रखा। सुखना झील के पास एक अच्छे से सरकारी गेस्टहाउस में हमारे ठहरने की व्यवस्था की गई थी और लॉ भवन नामक एक जगह पर फ़ेस्टिवल का आयोजन हुआ।</p>
<p>आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि 13 से 15 अप्रैल तक चले इस साहित्यिक मेले में जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल जैसी चमक-दमक नहीं थी और ना ही इसके आयोजन का स्तर उतना विशाल था। हिन्दीं, अंग्रेज़ी और पंजाबी साहित्य से संबंधित बमुश्किल 20-30 व्यक्तियों को मेले में वक्ता के तौर पर शिरक़त के लिए आमंत्रित किया गया था। संभवत: जानकारी के अभाव में श्रोता भी कोई बहुत संख्या में अधिक नहीं थे। एक नवनिर्मित संस्था का पहला कार्यक्रम होने के कारण व्यवस्था में भी कुछ कमियाँ थीं।</p>
<p><strong>इन तमाम बातों के बावजूद चंडीगढ़ फ़ेस्टिवल काफ़ी सफ़ल रहा।</strong> इस फ़ेस्टिवल को जयपुर फ़ेस्टिवल के शीशे में देखना ग़लत होगा। कुछ लोगों ने मिलकर पहला कदम उठाया है; कमियाँ रही हैं तो उनसे सबक भी सीखे गए हैं –इस निगाह से चंडीगढ़ का आयोजन सराहनीय रहा। बातें करने वाले लोग बहुत हैं लेकिन अपने उत्साह और कुछ अच्छा करने की चाहत को हर कोई वास्तविकता का जामा नहीं पहना पाता। मैं हर उस प्रयास का समर्थन करता हूँ जो हमारी भाषाओं की बेहतरी के लिए किया जा रहा है।</p>
<div id="attachment_1127" class="wp-caption aligncenter" style="width: 634px"><img class="size-full wp-image-1127" title="clf-2012" src="http://lalitkumar.in/hindi/wp-content/uploads/2012/04/clf-2012.jpg" alt="" width="624" height="415" /><p class="wp-caption-text">चंडीगढ़ लिटरेचर फ़ेस्टिवल के दौरान एक सत्र</p></div>
<p>तीन दिन के दौरान साहित्य से संबंधित कुछ रोचक किस्से और मुद्दे सामने आए। जयपुर से इतर चंडीगढ़ में समानान्तर सत्र नहीं थे। <strong>एक समय में एक ही सत्र आयोजित हो रहा था।</strong> “मंटो के सौ बरस”, “हिन्दी, इंटरनेट और माइक्रो फ़िक्शन”, “अंग्रेज़ी में चलता है, हिन्दी में खलता है”, “जैसी हक़ीकत वैसा फ़साना”, “तेरी मेरी कहानी” इत्यादि सत्रों सहित कुल पंद्रह सत्र तीन दिन में किए गए। कई सत्र लेखक द्वारा स्वलिखित पुस्तक-पठन के थे, दो कविता-पाठ के सत्र थे और इसके अलावा कुछ समय रंगारंग कार्यक्रमों को भी दिया गया।</p>
<p><strong>स्कूल के बच्चों को इस आयोजन में सम्मिलित होने के लिए विशेषरूप से प्रोत्साहित किया जाना एक नई पहल थी।</strong> बहुत से बच्चे आए और उन्होंने कवियों और लेखकों को सुना –उनसे सवाल जवाब किए –उनके करीब जाकर ऑटोग्राफ़ लिए। ये सब इन बच्चों के लिए ज़रूरी है क्योंकि अधिकांश बच्चे आजकल अंधाधुंध दौड़ती दुनिया की परीक्षाओं में अंक बटोरने वाली एक मशीन-मात्र बन कर रह जाते हैं। रचनात्मकता, कला, संस्कृति और साहित्य जैसे विषयों वे कट जाते हैं। ऐसे में उनका इस तरह के आयोजनों में जाना बहुत ज़रूरी है क्योंकि साहित्यिक गतिविधियाँ उनके दिल-दिमाग़ पर लिखने-पढ़ने की रोचकता और महत्ता का एक ना मिटने वाला निशान छोड़ जाती हैं। इनमें से हर बच्चा लेखक नहीं बनेगा –और हो सकता है कि अधिकांश बच्चे अच्छे पाठक भी ना बन पाएँ; लेकिन ऐसी गतिविधियों में उपस्थित होने से लेखन-पाठन के क्षेत्र में उनके बेहतर होने की संभावना तो बढ़ती ही है।</p>
<p>जहाँ तक मेरे व्यक्तिगत अनुभव की बात है तो मैं चंडीगढ़ से कई ना भूलने वाली यादें लेकर लौटा हूँ।  अधिकांश यादें बहुत अच्छी हैं पर कुछ यादें असहज करने वाली भी हैं। फ़ेस्टिवल के दौरान कई नए मित्र बने। मैं जहाँ भी जाता हूँ वहाँ मित्रता फैलाकर आता हूँ और मित्र बटोरकर लाता हूँ। यही मेरी सबसे बड़ी पूंजी है। <strong>कविता कोश को सराहने वाले तो अब चारे दिशाओं में मौजूद हैं। चंडीगढ़ भी कोई अपवाद नहीं था।</strong></p>
<p>बड़े आयोजनों में कुछ छोटी-छोटी ख़ामियाँ रह ही जाती हैं। आयोजकों को मिला अनुभव उन्हें अगले वर्ष बेहतर होनें में मदद देगा –इस आशा को मन में रखना बेहद ज़रूरी है। आयोजकों के लिए मेरे पास कुछ सुझाव भी हैं जो भावी आयोजनों में  उनके काम आएंगे –लेकिन ये सब समय आने पर और ज़रूरत होने पर मैं उन्हें प्रेषित कर दूंगा। फ़िलहाल तो मैं आयोजकों को बधाई देना चाहता हूँ; उनकी लगन व जज़्बे को सराहना चाहता हूँ। इस आयोजन के दौरान आमंत्रित अतिथियों के आराम का ध्यान रखने वाले सभी सवयंसेवकों को भी हार्दिक धन्यवाद। इनकी मेहनत के कारण पूरा आयोजन सफलतापूर्वक सम्पन्न हो पाया।</p>
<p>जो भी व्यक्ति या संस्था आगे बढ़कर कुछ अच्छा और नया करना चाहे –हमें चाहिए कि हम सभी उनकी मदद करें। आलोचना और टांग-खिंचाई करने से कुछ भी व्यवहारिक नहीं हो पाता; कोई सपना ज़मीनी हक़ीक़त नहीं बन पाता। <strong>ये बिल्कुल सत्य है कि आलोचक को सृजन नहीं करना होता;  इसीलिए वह आलोचना करता है।</strong></p>
<p>मैं अपनी और कविता कोश की ओर से चंड़ीगढ़ लिटरेचर फ़ेस्टिवल के बेहतरीन भविष्य की कामना करते हुए यह विश्वास दिलाता हूँ कि हमसे जो बन पड़ेगा –हम हर अच्छे कार्य में सहयोग करेंगे।</p>
<p><strong>पाठकों से:</strong> इस फ़ेस्टिवल के दौरान एक मुद्दा ये भी उठा कि साहित्यिक मेले लेखकों के लिए थकान का सबब बन रहे हैं! हर शहर अपना अलग साहित्यिक मेला आयोजित कर रहा है। क्या आपको लगता है कि ज़रूरत से अधिक साहित्यिक मेले आयोजित होने लगे हैं?</p>
<p><strong>एक और विषय पर मैं आपकी राय जानना चाहूंगा:</strong> साहित्यिक मेलों में अब साहित्य कितना है व्यापार कितना? क्या आपको लगता है कि साहित्यिक मेलों अब चमक-दमक ज़रूरत से अधिक है ये और व्यापार का माध्यम बन रहे हैं?</p>
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		<title>आकाशवाणी और विविध भारती की यादें</title>
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		<pubDate>Mon, 09 Apr 2012 16:03:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Lalit Kumar</dc:creator>
				<category><![CDATA[गीत-संगीत]]></category>

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		<description><![CDATA[हालहि में मैंने दूरदर्शन के बीते दिनों के बारे में कुछ लेख लिखे थे। हालांकि यह शृंखला अभी पूरी नहीं हुई है –इसमें एक-दो लेख और आने बाकी हैं लेकिन &#8230; <a href="http://lalitkumar.in/hindi/1119">Read more</a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="attachment_1120" class="wp-caption alignleft" style="width: 278px"><img class="size-full wp-image-1120" title="aakaashvani-logo" src="http://lalitkumar.in/hindi/wp-content/uploads/2012/04/aakaashvani-logo.jpg" alt="" width="268" height="268" /><p class="wp-caption-text">आकाशवाणी का प्रतीक चिह्न</p></div>
<p>हालहि में मैंने <a href="http://lalitkumar.in/hindi/1070" target="_blank">दूरदर्शन के बीते दिनों के बारे में कुछ लेख</a> लिखे थे। हालांकि यह शृंखला अभी पूरी नहीं हुई है –इसमें एक-दो लेख और आने बाकी हैं लेकिन एक पाठक राजेश्वरी जी की फ़रमाइश पर मैं दूरदर्शन की यादों को थोड़ा विराम देते हुए आज आकाशवाणी के बारे में बात करूंगा। <strong>जब आकाशवाणी ने कभी अपने श्रोताओं की फ़रमाइश नहीं टाली तो मैं अपने पाठकों की फ़रमाइश भला कैसे टाल सकता हूँ?!</strong></p>
<p>आजकल के एकदम साफ़ आवाज़ वाले एफ़.एम. रेडियो चैनलों और उन पर बड़ी शोख़ अदाओं में बोलने वाले उद्घोषकों से बिल्कुल अलग आकाशवाणी की बीती दुनिया थी। उस समय हम अपने रेडियो सेट पर लगे बटन को घुमा-घुमा कर स्टेशन पकड़ने की कोशिश किया करते थे। इन स्टेशनों में सबसे लोकप्रिय था विविध भारती।</p>
<p><span style="color: #993300;">“मीडियम वेव 1368 किलोहर्ट्ज़ पर ये विविध भारती की विज्ञापन प्रसारण सेवा का दिल्ली केन्द्र है। सात बज कर तीस मिनट हुआ चाहते है&#8230; अब आप सुनेंगे&#8230;”</span></p>
<p>चर्र-मर्र सुर्र-सर्र करते ट्रांजिस्टर से आती यह आवाज़ हमारे ज़हन में हमेशा के लिए छप चुकी है। 2 अक्तूबर 1957 को पहली बार विविध भारती से प्रसारण आरम्भ हुआ था। हर दिन करीब 15 से 17 घंटे तक मनोरंजक कार्यक्रम सुनाने वाले इस स्टेशन से फ़िल्मी गीतों, छोटे-छोटे नाटकों के अलावा कई तरह के ज्ञानवर्धक कार्यक्रम भी प्रसारित होते थे।</p>
<p><span style="color: #993300;">“पानीपत से सुरेश, मुकेश, सोनी, मुन्नी, पप्पू, झुमरी तिलैया से विकास, राधा, सुहासिनी, महेंद्र और उनके मित्र, आगरा से संतोष यादव, दिल्ली से बंटी, गुरदीप, मोहन, लक्ष्मी और उनके परिवार के सभी सदस्यों की फ़रमाइश अब सुनिए मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में फ़िल्म नील कमल का यह गीत। बोल लिखे हैं शकील बदायूंनी ने और संगीत है रवि का”</span></p>
<p><strong>बहुत से लोग सोचते हैं कि झुमरी तिलैया एक काल्पनिक जगह का नाम है</strong> –लेकिन क्या आप जानते हैं कि झुमरी तिलैया का अस्तित्व वास्तव में है? यह झारखंड के कोडरमा जिले में एक छोटा-सा कस्बा है जिसकी आबादी अब 70 हज़ार के करीब है। यहाँ के निवासियों के रेडियो प्रेम ने इस कस्बे के नाम को इतना मशहूर कर दिया कि आज भारत का बच्चा-बच्चा झुमरी तिलैया के नाम से वाकिफ़ है!</p>
<p>झुमरी तिलैया के लोग विविध भारती को बड़ी संख्या में फ़रमाइश भेजने के लिए जाने जाते हैं। यहाँ के निवासी रामेश्वर बर्णवाल का नाम तो लगभग हर रोज़ विविध भारती के किसी न किसी कार्यक्रम में फ़रमाइश-कर्ता के रूप में आता था। उस समय झुमरी तिलैया के लोगों के बीच एक प्रतियोगिता-सी लगी रहती थी कि कौन व्यक्ति अधिक फ़रमाइशी पत्र विविध भारती को भेजेगा। झुमरी तिलैया के निवासियों ने इतने फ़रमाइशी पत्र भेजे कि भारत में जन-जन की ज़ुबान पर इस छोटे से कस्बे का नाम चढ़ गया।</p>
<p>आइये अब सुनते हैं आकाश्वाणी का प्रसारण शुरु होने से पहले बजने वाली वो धुन जिससे करोड़ो लोगों की सुबह की शुरुआत होती थी!</p>
<p><a href="http://www.youtube.com/watch?v=MccsqD4KBgU">http://www.youtube.com/watch?v=MccsqD4KBgU</a></p>
<p>विविध भारती सुदूर सीमाओं पर तैनात हमारे जवानों के लिए भी मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन था। इसलिए विविध भारती ने सैनिकों के लिए <strong>“जयमाला”</strong> नाम से फ़िल्मी गीतों का एक विशेष कार्यक्रम शुरु किया हुआ था। फ़ौजी भाई आकाशवाणी को पत्र लिखकर अपनी फ़रमाइश भेजते थे और उनकी फ़रमाइश को पूरा करते हुए विविध भारती रोज़ शाम को सात बजे वही गीत बजाया करता था। “लांसनायक”, “सूबेदार”, “हवलदार”, “सिपाही” –फ़ौजी भाइयों के ये सब पदनाम आपने जयमाला में अक्सर सुने होंगे! कभी-कभी <strong>“विशेष जयमाला”</strong> नाम से इस कार्यक्रम का विशेष अंक प्रसारित किया जाता था जिसमें प्रसिद्ध कलाकार (जैसे कि लता मंगेशकर, अमिताभ बच्चन, राज कुमार इत्यादि) आकर फ़ौजी भाईयों का अत्साहवर्धन करते थे और उन्हें अपनी पसंद के गीत सुनवाते थे।</p>
<p><strong>बिनाका गीतमाला</strong> (जो बाद में सिबाका गीतमाला बन गया था) भी एक बेहद प्रसिद्ध कार्यक्रम था। अमीन सायानी ने इस कार्यक्रम को 1952 से 1994 तक लगातार प्रस्तुत किया।</p>
<p><span style="color: #993300;">“बहनों और भाईयों, अब बारी आती है उस गीत की जो पिछले हफ़्ते पाँचवीं पायदान पर था लेकिन इस बार यह दो पायदानों की छलांग लगा कर आ पहुँचा है नम्बर तीन पर”</span></p>
<p>बिनाका गीतमाला 1952 से 1988 तक रेडियो सिलोन से प्रसारित होता था; फिर 1989 से 1994 तक यह विविध भारती से प्रसारित हुआ। इस कार्यक्रम में हिन्दी सिनेमा के तत्कालीन गीतों को लोकप्रियता के क्रम में सुनवाया जाता था। बिनाका गीतमाला के श्रोताओं की संख्या 9 लाख से 20 लाख के बीच रही। 1953 से लेकर 1993 तक वर्ष का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत भी बिनाका गीतमाला में घोषित किया जाता था।</p>
<p>प्रथम वर्ष (यानी 1953) का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत बैजू बावरा फ़िल्म से था; “तू गंगा की मौज मैं जमुना का धारा”</p>
<p>अंतिम वर्ष (यानी 1993) का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत खलनायक फ़िल्म से था; “चोली के पीछे क्या है, चुनरी के नीचे क्या है”</p>
<p>इस जानकारी के आधार पर ही आप देख सकते हैं कि हमारी फ़िल्मों के गीत-संगीत में कितने बड़े पैमाने पर बदलाव आया है!</p>
<p>छोटी-छोटी कहानियों और नाटकों को सुनवाता था रात 9:30 बजे आने वाला कार्यक्रम <strong>“हवा महल”</strong> &#8230; आइये आपको हवा महल की कड़ी सुनवाता हूँ। इसमें आप हवा महल की शुरुआत में आने वाली धुन भी सुन सकेंगे&#8230; इस कड़ी में सुनवाए गए नाटक का नाम है “मेहमान भगाऊ नुस्ख़े”</p>
<p><a href="http://www.youtube.com/watch?v=c3PD--dK6d8">http://www.youtube.com/watch?v=c3PD&#8211;dK6d8</a></p>
<p>हवा महल के बाद रात दस बजे <strong>“छाया गीत”</strong> प्रसारित हुआ करता था –जिसमें पुराने सुमधुर फ़िल्मी गीतों को सुनवाया जाता था। गर्मी के दिनों में छत पर बिछे बिस्तर पर लेटे हुए इन गीतों को सुनते-सुनते कब आंख लग जाती थी पता ही नहीं चलता था।</p>
<p>शुक्रवार की शाम को <strong>फ़िल्मी कव्वालियों का एक कार्यक्रम</strong> आया करता था। बरसात की रात फ़िल्म की कव्वाली “ना तो कारवाँ की तलाश है” को मैंने पहले-पहल इसी कार्यक्रम में सुना&#8230; और फिर तो इस रचना का मुरीद होकर रह गया।</p>
<p><strong>हरियाणवी रागनियों</strong> का एक कार्यक्रम भी विविध भारती के दिल्ली केन्द्र से प्रसारित होता था। मांगेराम, लखमीचंद, नीलम की गाई हुई रागनियाँ एक अलग ही समां बांध देती थीं।</p>
<p>मेरा एक और पसंदीदा कार्यक्रम रविवार को दोपहर दो बजे आता था&#8230; “चुन्नु पढ़ता डायमंड कॉमिक्स, मुन्नी पढ़ती डायमंड कॉमिक्स&#8230; मजेदार ये डायमंड कॉमिक्स” की धुन से शुरु होने वाले इस कार्यक्रम में <strong>डायमंड कॉमिक्स</strong> की कहानियों के बारे में बताया जाता थ। चाचा चौधरी, बिल्लू, पिंकी इत्यादि किरदारों की आने वाली कॉमिक्स का विज्ञापन इस कार्यक्रम के ज़रिए होता था।</p>
<p>इनके अलावा भी ढ़ेरों कार्यक्रम हैं जो रेडियो और विविध भारती के स्वर्णिम दिनों से आज तक हमें याद हैं। भूले बिसरे गीत, बाइस्कोप की बातें, संगम, सेहतनामा, हैलो फ़रमाइश, पिटारा इत्यादि बहुत से कार्यक्रम सुनना हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गए थे। ऐसा नहीं है कि आज रेडियो या विविध भारती नहीं है –लेकिन आज समय बदल चुका है&#8230; ज़िन्दगी तेज़ हो गई है&#8230; लोगों की पसंद बदल गई है&#8230; पर हम भाग्यशाली हैं कि हमनें रेडियो के उन स्वर्णिम दिनों को देखा है।</p>
<p>आपको यह लेख कैसा लगा –ज़रूर बताएँ&#8230; मैं जानता हूँ कि बहुत कुछ मैं इस लेख में आने से छूट गया है। आप कृपया <strong>अपनी यादों को नीचे कमेंट्स के ज़रिए साझा करें ताकि अन्य पाठक भी इसका लाभ उठा सकें।</strong></p>
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		<title>कहेहू तें कछु दुख घटि होई</title>
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		<pubDate>Mon, 02 Apr 2012 12:46:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Lalit Kumar</dc:creator>
				<category><![CDATA[विविध]]></category>

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		<description><![CDATA[प्रेम में यदि विरह हो जाए तो जो कष्ट होता है उसका बयान करना असंभव है। जितना सच्चा प्रेम होगा उतना ही दुष्कर विरह से गुज़रना हो जाएगा। एक तरह &#8230; <a href="http://lalitkumar.in/hindi/1115">Read more</a>]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="attachment_1116" class="wp-caption alignleft" style="width: 259px"><img class="size-full wp-image-1116" title="love-separation" src="http://lalitkumar.in/hindi/wp-content/uploads/2012/04/love-separation.jpg" alt="" width="249" height="186" /><p class="wp-caption-text">विरह का दुख</p></div>
<p>प्रेम में यदि विरह हो जाए तो जो कष्ट होता है उसका बयान करना असंभव है। जितना सच्चा प्रेम होगा उतना ही दुष्कर विरह से गुज़रना हो जाएगा। एक तरह से विरह का दुख प्रेम की सच्चाई और गहराई को मापने का पैमाना होता है। जिसे विरह में दुख नहीं होता –उसने प्रेम के तत्व, उसकी सत्यता, उसके असीम आनंद और उसकी व्यापकता को कभी अनुभव ही नहीं किया। केवल छिछला प्रेम ही विरह के दुख से सुरक्षित रहता है।</p>
<p>विरह का दुख और भी दारुण हो जाता है यदि पुनर्मिलन की आस भी समाप्त हो जाए। तब तो मृत्यु ही ऐसे दुख का एकमात्र उपचार लगने लगता है। विरह जहाँ एक निश्चित समयाविधि के लिए होता है वहाँ भी इसके दुख की तीव्रता तो कम नहीं होती –हाँ ये ज़रूर है कि इस दुख में आस की हल्की-सी मिठास घुली होने के कारण जीना संभव हो जाता है।</p>
<blockquote><p>कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।</p>
<p>नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।।</p>
<p>कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।</p>
<p>जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।</p>
<p>कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।।</p>
<p>तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।</p>
<p>सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं।।</p></blockquote>
<p>रामचरितमानस के सुंदरकांड से ली गई इन पंक्तियों में गोस्वामी तुलसीदास ने विरह-जनित प्रेम की बहुत ही सुंदर व्याख्या की है। प्रेम में विरह हुआ है या विरह प्रेम को बढ़ा रहा है –कुछ मालूम ही नहीं पड़ता। यह प्रेम का वह रूप है जिसमें प्रेमी युगल के मन मिलकर एक हो जाते हैं। फिर शरीरों के बीच की दूरी का कोई महत्तव नहीं रहता।</p>
<p>इन पंक्तियों में राम का संदेश हनुमान के द्वारा सीता जी को सुनाया जा रहा है। राम कहते हैं कि “सीता, जबसे मैं तुमसे बिछड़ा हूँ, मेरे लिए तो हर चीज़ विपरीत हो गई है। पेड़ों पर आए नए कोमल पत्ते मुझे अग्नि की जिव्हाओं (लपटों) से लगते हैं; रातें कालरात्री की तरह भयानक हो गई हैं और चंद्रमा सूर्य के समान तन को जलाने वाली ऊष्मा देने लगा है। कमल पुष्पों के शैया ऐसी लगती है जैसे कि तीरों का बिछौना हो और वर्षा के मेघ उबलता हुआ तेल बरसाते महसूस होते हैं। जो पहले मित्रवत लगते थे अब वे पीड़ा देने लगे हैं; शीतम मंद और सुगंधित वायु अब मुझे नाग की फुंकार जैसी लगती है। अगर अपना दुख किसी से कह दिया जाए तो दुख कुछ कम हो जाता है लेकिन मैं किससे अपना दुख कहूँ? कोई भी ऐसा नहीं है जो मेरे इस दुख को समझ सके। मेरे तुम्हारे प्रेम का सत्य केवल मेरा मन जानता है और मेरा मन तो सदा तुम्हारे ही पास रहता है। बस इसी से अपने प्रति मेरे प्रेम को जान लो।</p>
<p>बस यही प्रार्थना है कि ईश्वर किसी को विरह का दुख ना दे।</p>
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