
एक अच्छे ब्लॉग की ज़रूरतें – भाग 3
आज हम बात करते हैं कि ब्लॉग्स पर क्या लिखा जाए और कैसे लिखा जाए।
मैं इंटरनेट पर हिन्दी भाषा से कई वर्षों से जुड़ा हुआ हूँ। इस दौरान सैंकड़ों ब्लॉग्स देखे हैं और सैंकडों ब्लॉगर्स से विभिन्न स्तरों पर बातचीत की है। अधिकांश लोगो का कहना है कि वे “स्वांत: सुखाय” अर्थात केवल अपनी ख़ुशी के लिए लिखते हैं। हालांकि सामान्य रूप से कहूँ तो मेरा अनुभव कुछ और ही कहता है। आगे पढ़ने से पहले आप समझ लें की मेरी कुछ बातें आपको बुरी भी लग सकती है –लेकिन जब तक हिन्दी ब्लॉग जगत अपनी शल्य-चिकित्सा खुद नहीं करेगा –जब तक यह दुनिया स्वयं के साथ ईमानदार होना नहीं सीखेगी –तब तक एक अच्छे हिन्दी ब्लॉग जगत का सपना केवल सभाओं में अक्सर दोहराया जाने वाला जुमला मात्र बनकर रह जाएगा।
सबसे पहले हमें यह स्वीकारना होगा कि शायद एक प्रतिशत लोग भी “स्वांत: सुखाय” नहीं लिखते। हालांकि यह भी सच है कि चाहे एक प्रतिशत से कम ही सही पर कुछ लोग वाकई में “स्वांत: सुखाय” लिखते हैं। मैं ऐसे कुछ लोगो के ब्लॉग्स तो देख ही चुका हूँ।
अधिकांशत: लोग “स्वांत: सुखाय” नहीं लिखते उनके लिखने के पीछे हमेशा कोई ना कोई उद्देश्य या इच्छा छिपी रहती है। ऐसा होना कोई बुरी बात नहीं है –लेकिन स्वयं के साथ ईमानदार होना ज़रूरी है। अगर आप “स्वांत: सुखाय” नहीं लिखते तो इसे स्वीकारने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए।
सबसे बड़ी इच्छा तो टिप्पणियाँ पाने की होती है। लोग आपके ब्लॉग पर टिप्पणियाँ करें और आपके लिखे को (चाहे पढ़े बिना ही सही पर) सराहें। यकीन मानिए, यह हिन्दी ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी कमज़ोरियों में से एक है। टिप्पणी पाने की इच्छा कोई असामान्य बात नहीं लेकिन कोई टिप्पणी आई या नहीं यह देखने के लिए दिन में पचास बार ब्लॉग खोलना ज़रूर असामान्य है।
टिप्पणियों के प्रति इतना अधिक झुकाव ठीक नहीं है। इस परिपाटी के चलते लेखन और पाठन दोनो पर बुरा प्रभाव पड़ता है। मैं ये नहीं कहूँगा कि अगर कोई मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी करता है तो मुझे अच्छा नहीं लगता। मुझे भी यकीनन अच्छा लगता है –लेकिन मैं टिप्पणियों की ओर अधिक झुकने की बजाए इस बात को ज़्यादा अहमियत देता हूँ कि कितने लोग मेरा लिखा पढ़ते हैं और कितना पढ़ते हैं। “बहुत सुंदर”, “वाह”, “क्या खूब लिखा है” जैसी टिप्पणियाँ मुझे कभी भी आकर्षित नहीं करती –चाहे वे सैंकड़ों की संख्या में ही क्यों ना आएँ। इसके बनिस्बत चाहे दो-चार ही सही पर मैं ऐसी टिप्पणियाँ चाहूँगा जिनमें पाठकों ने मेरे लिखे को ठीक से पढ़कर और उस पर सोच-विचार करके कुछ रचनात्मक लिखा हो। आज ऐसी सुविधाएँ उपलब्ध हैं जिनके ज़रिये आप ये जान सकते हैं कि कितने लोग आपके ब्लॉग पर आए। इसके बारे में तो आप सभी जानते हैं। लेकिन इन आंकड़ो के अलावा यह जानकारी भी उपलब्ध होती है कि पाठकों ने औसतन कितना समय आपके ब्लॉग पर बिताया। मेरे लिए यह एक बहुत महत्वपूर्ण आंकड़ा है और मैं टिप्पणियों की संख्या से अधिक इसी आंकड़े को महत्व देता हूँ। इससे मुझे पता लगता है कि मेरे लिखे को कोई वाकई में पढ़ भी रहा है या नहीं। हिन्दी ब्लॉग जगत में एक चलन है कि लेख को पढ़कर या बिना पढ़े “पाठक” एक लाइन की टिप्पणी लिखकर चलते बनते हैं। बहुत से लोगो का मानना है कि इसके पीछे टिप्पणियों के लेन-देन की मानसिकता काम करती है। आज अगर मैं आपके ब्लॉग पर टिप्पणी कर रहा हूँ तो कल आपसे भी यह अपेक्षा होगी कि आप मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी करें। मैं इस चलन को ग़लत या सही नहीं ठहरा रहा –मैं केवल इतना कह रहा हूँ कि इस तरह की टिप्पणियों के बूते पर आप यह नहीं कह सकते कि आपका लिखा कैसा है और कितने लोगों ने इसे वाकई पढ़ा है। और फिर देखा जाए तो पाठक के केवल पढ़ लेने मात्र से आपका लेखन सफल नहीं हो जाता। आपके लिखे में कुछ ऐसा होना चाहिए जो पढ़ लिए जाने के बाद पाठक को सोचने पर मजबूर करे… या उसके काम आए।
हिन्दी ब्लॉग जगत प्रयोगो के दौर के अंत में चल रहा है। अधिकांश प्रयोग पहले ही हो चुके हैं –जैसे कि सामूहिक ब्लॉगिंग, ब्लॉग चर्चाएँ, ब्लॉग अन्वेषण इत्यादि। अब समय है कि हम सार्थक और गंभीर लेखन की ओर अग्रसर हों। कुछ भी लिखने से पहले आप उसके बारे में उसी तरह से मेहनत करें जिस तरह आप तब करते यदि आपका लिखा एक पुस्तक की शक्ल में छपने जाता। ब्लॉगिंग को कमतर ना आंके। आप अच्छा लिखेंगे तभी आपको अच्छे और नियमित पाठक मिलेंगे। शोध करके, सोच-विचार कर जितना सटीक और अच्छा हो सके उतना अच्छा लिखें।
हिन्दी ब्लॉग्स का सबसे बड़ा हिस्सा कविताओं के ब्लॉग्स का है। कवि तो हर किसी के अंदर होता है और सतत लेखन-पाठन के ज़रिए अपने अंदर के कवि को निखारा भी जा सकता है। लेकिन मुझे यह जानकर आश्चर्य होता है कि अधिकांश नए-पुराने कवि इस बात के बारे में कभी नहीं सोचते कि वे कविताओं के अलावा भी हिन्दी में बहुत कुछ लिख सकते हैं। क्या एक सरकारी महकमें में काम करने वाले किसी कवि की काव्य के अलावा किसी और विषय में रुचि नहीं होती? या किसी सॉफ़्टवेयर इंजिनीयर कवि की किसी और विषय में रुचि नहीं होती? फिर अक्सर क्यों लोग केवल काव्य को ही अभिव्यक्ति का माध्यम बनाते हैं? ठीक है, कविताएँ भी लिखिए –लेकिन यह ज़रूर सोचिए कि आप लेख भी तो लिख सकते हैं ना। किसी भी विषय पर एक अच्छा लेख अगर आपने दो महीने में भी लिख दिया तो कितना अच्छा होगा!
हिन्दी ब्लॉगिंग में विषयों का अभाव है। कुछ लोगो ने अच्छी पहल की हुई हैं -जैसे कि आयुर्वेद, जड़ी-बूटियों का महत्व, शेयर बाज़ार, आर्थिक मसले, ब्लॉग तकनीक इत्यादि विषयो पर कुछ अच्छे ब्लॉग्स हैं –लेकिन ये नाकाफ़ी हैं। इन विषयों पर लिखने वाले कम हैं और हज़ारों अन्य विषय ऐसे हैं जिन पर कुछ भी नहीं लिखा जाता। इस अभाव को आप अवसर की तरह भी देख सकते हैं!
ब्लॉग्स लेखन के लिए हैं। प्रतियोगिता, व्यक्तिगत आक्षेप, लड़ाई-झगड़े, गाली-गलौच, गुटबाज़ी, गुटों या मतों की राजनीति –आप इन सभी बातों से बचिए… इस तरह के लेखन का तो कहीं भी स्थान नहीं है। किसी से भी आपका वैमनस्य है –तो उसे ब्लॉग पोस्ट्स के ज़रिये मत प्रकाश में लाइये –सामने वाले व्यक्ति से मिलिये या फ़ोन कीजिए और आपस में बात करके मुआमला सुलझा लीजिए। ब्लॉग पर यह सब लिखकर आप अपनी छवि और लेखक के रूप में अपने नाम को केवल हानि ही पँहुचाते हैं। जैसा कि अंग्रेज़ी में कहा जाता है “Don’t wash your dirty linen in public”…
एक और बेहद महत्वपूर्ण बात… आप इंटरनेट पर जो कुछ भी लिख देते हैं वह हमेशा के लिए अमिट हो जाता है। यह मत सोचिए कि आपने अपना लिखा डिलीट कर दिया तो अब उसे कोई नहीं पढ़ पाएगा। कहीं ना कहीं आपके लिखे को फिर भी ढूंढा जा सकता है। इसलिए कोई भी शब्द ब्लॉग पर लिखने से पहले यह सोच लीजिए कि क्या वह शब्द आपके परिवार द्वारा पढ़े जाने योग्य है?… हो सकता है दस साल बाद आपके बच्चों के सामने आपका लिखा आ जाए। इस बात को सोचकर ब्लॉगिंग कीजिए।
ब्लॉग केवल लेखन के लिए है… अच्छी, जानकारीपूर्ण, रोचक और शोधपरक सामग्री के लिए…
अपनी पहचान गंभीर, सटीक और स्वस्थ लेखन से बनाइये…












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