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© ललित कुमार; बिना लिखित अनुमति इस लेख का कहीं भी और किसी भी प्रारूप में प्रयोग करना वर्जित है।
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© लेखक: Lalit Kumar
February 22, 2012
Lalit Kumar on February 22nd, 2012

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आपको याद होगा कि कुछ समय पहले मैंने “अच्छे ब्लॉग्स की ज़रूरतें” नामक एक लेखमाला तैयार कर आपके सामने पेश की थी। इस लेखमाला को हिन्दी ब्लॉगर्स ने खूब सराहा और इसमें कही बातों पर अमल करके कई नए पुराने हिन्दी ब्लॉगर्स ने अपने ब्लॉग और ब्लॉगिंग में काफ़ी सुधार किया।

इसी लेखमाला में दी गई को आधार बना कर मैंने हिन्दी के बेहतरीन ब्लॉग्स की एक सूची भी बनानी आरंभ की थी लेकिन व्यस्तताओं के चलते वह काम बीच में ही रुक गया। अब मैंने इस कार्य को फिर से आगे बढ़ाना शुरु किया है। अब से यह सूची मेरे तकनीकी जानकारी के ब्लॉग techwelkin.com पर उपलब्ध रहेगी।

सूची का पता: www.techwelkin.com/best-hindi-blogs.htm

किसी भी ब्लॉग को इस सूची में शामिल करने से पहले मैं बहुत सी बातों पर ध्यान देता हूँ; जिनमें लेखन की नियमितता, भाषा कौशल, ब्लॉग का रंग-रूप, लेखक की पाठकों के प्रति ज़िम्मेदारी, लेखन के प्रति गंभीरता, विषय चयन, विषय की जानकारी इत्यादि बातें शामिल होती हैं।

बेहतरीन हिन्दी ब्लॉग्स की यह सूची हिन्दी के हज़ारों ब्लॉग्स में से उन चुनिंदा ब्लॉग्स को उजागर करने का एक प्रयास है जो हिन्दी में बढ़िया पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराते हैं। इस सूची से नए ब्लॉगर्स को भी यह समझने में मदद मिलेगी कि किस तरह उन्हें अपने ब्लॉग और लेखन को आगे बढ़ाना चाहिए।

इन चुनिंदा ब्लॉग के लेखकों के कार्य की सराहना करने के लिए मैंने एक विजेट भी उपलब्ध कराई है जिसे सूचीबद्ध ब्लॉग्स के लेखक अपने ब्लॉग्स पर गर्वपूर्वक लगा सकते हैं। ये लेखकगण अपने बेहतरीन कार्य के लिए इस सम्मान के हर तरह से सुपात्र हैं।

इस सूची में शामिल करने के लिए किसी भी ब्लॉग का सुझाव भेजने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि ब्लॉग कम-से-कम एक वर्ष पुराना है, उस पर कम-से-कम 100 पोस्ट हो चुकी हैं और सभी पोस्ट एक ही व्यक्ति की लिखी हुई हैं।

कविताओं के ब्लॉग्स, सामूहिक ब्लॉग्स और पत्रिका या समाचार पत्र की तरह के ब्लॉग्स फ़िलहाल इस सूची में शामिल नहीं किए जा रहे हैं।

हिन्दी ब्लॉग्स पर उपलब्ध पाठ्य सामग्री में विविधता को बढ़वा देने के लिए इस सूची में किसी विषय-विशेष पर आधारित ब्लॉग्स को अलग से सूचीबद्ध करके प्रोत्साहन दिया जाता है।

और हाँ! इस बार मैंने सूची में “दशमलव” को भी शामिल किया है क्योंकि मेरा यह ब्लॉग उन सभी पैमानों पर खरा उतरता है जो इस सूची का आधार हैं :-)

आशा है कि आपको यह प्रयास उपयोगी लगेगा।

Wednesday, February 22, 2012 को पोस्ट किया |

लालित्य इंटरनेशनल कविता कोश वेबसाइट की डेवेलपमेंट और मेंटेनेंस के लिए संविदाएँ (quotations) आमंत्रित करती है। वेब डेवलपमेंट से जुड़ी सभी बेहतरीन कम्पनियाँ इस प्रक्रिया में हिस्सा ले सकती हैं। यदि आप किसी वेब डेवलपमेंट कम्पनी से जुड़े हैं तो आप quotation भेज सकते हैं।

कविता कोश (www.kavitakosh.org) को अब “हिन्दी काव्य का गूगल” कहा जाने लगा है। हिन्दी यूनिकोड में बनी 52,000 पन्नों की इस लोकप्रिय वेबसाइट में पन्नों की संख्या को अगले दो साल में 200,000 तक पहुँचाने लक्ष्य रखा गया है। हर महीने 125,000 से भी अधिक लोग कविता कोश पर आते हैं और करीब 20,00,000 पन्नें पढ़ते हैं। लालित्य इंटरनेशनल नामक संस्था कविता कोश परियोजना को आर्थिक समर्थन देती है।

चुनी गई कम्पनी को जो कार्य करने होंगे उनके बारे में अधिक जानकारी नीचे अंग्रेज़ी में दी जा रही है।

अपनी  quotations को आप kavitakosh@gmail.com पर भेजें।

Quotations भेजने की अंतिम तिथि: 24 फ़रवरी 2012

कविता कोश का लोगो

Lalitya International Center for Arts and Culture (LICAC) is looking for a company to manage and further develop www.kavitakosh.org website. This is a very unique project and therefore needs an unconventional team of workers to maintenance and development.

Kavita Kosh is a content based website –the team must contain not only good technical people but also people with excellent (almost author like) command on written Hindi language. At least one person with interest and good knowledge of Indian poetry should also be part of the team.

We are looking for innovative, out-of-the-box thinkers and proactive people for this project. If anything, these traits are the most important ones if we want to achieve our goals with regard to Kavita Kosh.

The project

  • URL: www.kavitakosh.org (The website has been facing server issues due to massive traffic –so it may not be available at times)
  • The website is known as “Google of Indian poetry” and is headed to be the “Google of World Poetry” in next 5-10 years. This is just to convey the size, importance and seriousness of the project.
  • Website currently has more than 50,000 HTML pages
  • Expected to reach over 200,000 HTML pages in next 2 years
  • Monthly traffic: More than 2 million page views ; 125,000 unique visitors
  • Traffic may cross 5 million page views mark within a year.
  • Uses Hindi Unicode font (may begin to use other scripts (e.g. Arabic) soon)
  • Basic platform: LAMP + MediaWiki

The company is expected to perform the following task on a daily basis. This list contains the minimum that is expected to be done –more things could be anytime added on ad-hoc basis.

  • Server management (at present we host the website on a shared server; may move on to a VPS or even a dedicated server)
  • Type in Hindi, and other languages written in Devanagari script, with correct spellings (using Unicode font). Excellent writing skill in Hindi is  a MUST.
  • Monitor content addition in Kavita Kosh (we would not mind having a person with good poetic sense in the maintenance team)
  • Continuous and appropriate graphic designing as the need may be
  • MediaWiki management (the company/person must be a MediaWiki genius)
  • Implementation of MediaWiki upgrades and security patches
  • Implementation and tweaking of MW extensions
  • Continuous development of integrated programs to provide more and more facilities to the readers Kavita Kosh
  • Fight hackers: Kavita Kosh attracts hack attempts as well
  • Fight Spammers
  • Search Engine Optimization

Please send your quotation for annual maintenance (which will include the above-mentioned  work)

LAST DATE FOR SENDING YOUR QUOTATIONS: 24 February 2012

Saturday, February 18, 2012 को पोस्ट किया |

वैलेंटाइन्स डे

आज वैलेंटाइन्स डे है। इसे हिन्दी में प्रेम दिवस भी कहा जाने लगा है। आप चाहे जो भी हों लेकिन यह दिन आपको प्रभावित किए बिना नहीं रहता। आज इस अवसर की पैठ हमारे बीच कुछ इस कदर गहरी हो चुकी है कि यह अब होली-दिवाली की तरह जीवन का अभिन्न अंग लगने लगा है। बहुत से लोग हैं जो वैलेंटाइन्स डे को भारतीय संस्कृति के विरुद्ध मानते हैं। मेरा मानना है कि संस्कृति कोई ठोस वस्तु नहीं है जो अपना आकार ना बदल सके। संस्कृति तो समय की नदी में बहता पानी है जो हर पल अपनी सूरत बदल रहा होता है। वैलेंटाइन्स डे को जिस तरह हमारे युवाओं ने स्वीकारा है उससे यह बात ज़ाहिर होती है कि पहले से ही इस तरह के किसी उपलक्ष्य की ज़रूरत महसूस की जा रही थी। जब हमारी संस्कृति इस ज़रूरत को पूरा नहीं कर पाई तो एक विदेशी त्यौहार को हमने अपना लिया। इसमें मुझे कुछ भी ग़लत नहीं लगता।

हालांकि एक बात है जो मुझे कुछ हद तक अखरती है। हमनें वैलेंटाइन्स डे को अपना तो लिया लेकिन इसके मूल स्वरूप को समझ नहीं पाए। यह दिन प्रेमी-प्रेमिकाओं के बीच रहने वाली रूमानी भावनाओं के प्रकटन का दिन है। जबकि हो यह रहा है कि आजकल हर व्यक्ति हर दूसरे व्यक्ति को “हैप्पी वैलेंटाइन्स डे” कहता दिखाई देता है। प्रेम भाव तो सबके बीच होता है और होना भी चाहिए –लेकिन वैलेंटाइन्स डे एक ख़ास किस्म के प्रेम को ज़ाहिर करने और उसकी खुशी मनाने का दिन है। यहाँ हम एक स्त्री और एक पुरुष के बीच पनपे रूमानी प्रेम की बात कर रहे हैं –बहुधा इस प्रेम की परिणति स्त्री-पुरुष के बीच विवाह में होती है।

आजकल हो यह रहा है कि हर मित्र दूसरे मित्र को एस.एम.एस. करके वैलेंटाइन्स डे की शुभकामनाएँ देता दिखता है। यहाँ तक की पुरुष पुरुष को और स्त्री स्त्री को वैलेंटाइन्स डे की शुभकामनाएँ देते हैं! मेरे विचार से वैलेंटाइन्स डे का यह अजीब स्वरूप हमारे बीच बाज़ार ने खड़ा किया है। जितने लोग स्वयं को इस दिन से जुड़ा महसूस करेंगे उतना ही अधिक बाज़ार में व्यापार भी होगा। इसके चलते बाज़ार ने कभी-भी खालिस रूमानी प्यार से इस दिन को नहीं जुड़ने दिया। एस.एम.एस. भेजना आजकल इतना आसान है कि लोग एस.एम.एस. भेज ही देते हैं और बस यह प्रथा चल निकलती है कि हर कोई हर किसी को वैलेंटाइन डे की शुभकामनाएँ देता दिखाई देता है!

प्रेम के विभिन्न रूपों की खुशी मनाने के आज हमारे पास सभी मौके हैं। पिता-दिवस, माता-दिवस, मित्र-दिवस, रक्षा बंधन, करवा-चौथ इत्यादि मौके प्रेम के इज़हार के लिए ही तो हैं ना। इसलिए सही दिन पर सही व्यक्ति को शुभकामना देना बेहतर है। वैलेंटाइन डे को प्रेमियों के लिए छोड़ दिया जाए तो बेहतर रहेगा।

Tuesday, February 14, 2012 को पोस्ट किया |

अंगदान : जीवनदान... रक्तदान, नेत्रदान और अंगदान कीजिए

अंगदान से संबंधित मेरे पिछले लेख का जो असर हुआ उससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ। मैं अपने पाठकों को रक्तदान, नेत्रदान व अंगदान के लिए प्रोत्साहित करना चाहता था। पाठकों ने इस बाबत जो प्रशंसनीय प्रतिक्रिया दी है उससे मेरा पिछला लेख लिखने का उद्देश्य पूर्ण हो गया।

दशमलव के बहुत से पाठकों ने पूछा है कि वे किस तरह से रक्तदान, नेत्रदान व अंगदान कर सकते हैं। इससे संबंधित अधिक जानकारी तो मेरे पास नहीं है –लेकिन जितनी भी जानकारी है –उसे मैं इस लेख में लिखने का प्रयास करूंगा। साथ ही पाठकों से निवेदन है कि वे अन्य जानकारी भी कमेंट्स के ज़रिए मेरे साथ बांटे –मैं आपके द्वारा दी गई जानकारी को इस लेख में जोड़ता चला जाऊंगा –ताकि एक बेहतर जानकारीपूर्ण लेख तैय्यर हो सके।

देखिए, रक्तदान तो आप हर तीन महीने में बिना किसी समस्या के कर सकते हैं। नज़दीक के किसी भी बड़े अस्पताल में जाकर आप खून दे सकते हैं। एक बार में आपसे एक यूनिट खून लिया जाता है और यकीन मानिए रक्तदान के बाद पता भी नहीं चलता कि आपके शरीर से एक यूनिट खून कम हो गया है। आपका शरीर नए रक्त अपने आप और बहुत जल्दी निर्माण कर लेता है। इसके लिए आपको कोई विशेष खुराक लेने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती। रक्तदान आपके लिए भी फ़ायदेमंद है क्योंकि इससे आपके शरीर में नया रक्त बनता है।

अंगदान (जिसमें नेत्रदान भी शामिल है) करना वस्तुत: केवल एक इच्छा ज़ाहिर करना होता है कि मृत्यु के पश्चात आपके अंग निकाल लिए जाएँ और उनका प्रत्यारोपण ज़रूरतमंद मरीज़ों के शरीर में कर दिया जाए। जीवित व्यक्तियों के अंग नहीं निकाले जाते –लेकिन जीवन के रहते आप अंगदान की अपनी इच्छा ज़ाहिर कर सकते हैं। इसके लिए आप नज़दीक के किसी भी बड़े अस्पताल से सम्पर्क कर सकते हैं। आपको एक साधारण-सा फ़ॉर्म भरना होगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करने होंगे। इस फ़ॉर्म पर हस्ताक्षर करके आप डॉक्टरों को यह अधिकार दे रहे होते हैं कि आपके इस दुनिया से जाने के बाद वे आपके अंगों को आपके शरीर से निकाल सकते हैं। आप अपने किन अंगों को दान करना चाहते हैं यह आप इसी फ़ॉर्म में बता सकते हैं।

फ़ॉर्म भरना एक बात है लेकिन इससे भी ज़रूरी बात यह है कि आप अपने परिवार व निकट मित्रों को अंगदान के अपने निर्णय की जानकारी दें। अपने परिवार को इस बात के लिए तैयार करें कि वे आपकी मृत्यु के पश्चात जल्द-से-जल्द डॉक्टरों को सूचित करें ताकि आपके अंगों को खराब होने से पहले की सुरक्षित रूप से निकाला जा सके। किसी भी प्रियजन की मृत्यु एक बेहद दुखद घटना होती है –और ऐसे में उसकी देह की चीर-फाड़ के बारे में सोच कर परिजन विचलित हो जाते हैं और डॉक्टरों को सूचित नहीं करते। आपके परिजन डॉक्टरों को सूचित करें यह आपको ही अपने जीवनकाल में सुनिश्चित करना होगा। इसके लिए आप उनके साथ बैठकर अंगदान की उपयोगिता के बारे में चर्चा करें तो बात बन सकती है। यदि अंगदान को आप अपनी अंतिम इच्छा के तौर पर पेश करेंगे तो भी शायद आपके परिजन डॉक्टरों को सूचित करने में आनाकानी ना करें।

अंग निकाल लेने के बाद डॉक्टर मृत शरीर को इस तरह से सी देते हैं कि पता ही नहीं चलता कि इस शरीर से अंग निकाले गए हैं। इससे दिवंगत व्यक्ति के अंतिम संस्कारों पर भी कोई असर नहीं पड़ता।

आप निम्नलिखित अंगों का दान कर सकते हैं:

  • अंदरूनी अंग (दिल, गुर्दे, फ़ेफ़डे, पैक्रियाज, आंतें, जिगर)
  • त्वचा
  • अस्थियाँ व अस्थि-मज्जा (bone and bone marrow)
  • आंखे (कॉर्निया)

कुछ अन्य महत्तवपूर्ण बातें:

  • जीवित व्यक्तियों के अंग नहीं निकाले जाते
  • मृत्यु के बाद अंग निकालने से पहले परिजनों की अनुमति मिलना आवश्यक है। इसलिए अपने परिजनों को अपने निर्णय के बारे में ज़रूर सूचित करें
  • कमज़ोर दृष्टि वाले लोग भी आंखे दान दे सकते हैं
  • किसी भी उम्र का व्यक्ति अंगदान कर सकता है। 18 वर्ष से कम उम्र वाले व्यक्ति के अभिभावकों को भी इसके लिए अनुमति देनी होगी।
  • अंगदान का फ़ॉर्म भरने के बाद आपको एक दानकर्ता कार्ड (Donor Card) मिलता है। इस कार्ड को आप हमेशा अपने पर्स में रखें ताकि किसी दुर्घटना में घर से दूर मृत्यु होने की स्थिति में डॉक्टर यह कार्ड देखकर आपकी अंगदान की इच्छा को जान सकें

अंगदान के लिए आपको कई अस्पतालों के फ़ॉर्म ऑनलाइन भी मिल जाते हैं:

Monday, February 13, 2012 को पोस्ट किया |

आपका रक्तदान, नेत्रदान और अंगदान किसी को जीवन दे सकता है

मैं बहुत खुश हूँ; क्योंकि आज मैंने अपनी एक दिली-ख़्वाहिश को अमली जामा पहना दिया है।

आज मैंने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को अपना पूरा शरीर दान कर दिया है। अब मेरे इस दुनिया से चले जाने के बाद मेरे सारे अंगों (दिल, जिगर, आंखे, फ़ेफ़ड़े, गुर्दे इत्यादि) को मेरे शरीर से निकाल लिया जाएगा और ज़रूरतमंद मरीज़ों में इन अंगो का प्रत्यारोपण कर दिया जाएगा। ऐसा करना बचपन से ही मेरी इच्छा रही थी। आज AIIMS को अपना स्वीकृति-पत्र भेज कर मैंने इस इच्छा को पूरा कर लिया है।

एक गहरा-सा सुकून महसूस हो रहा है… अच्छा-सा लग रहा है!…

कहा जाता है कि अपने किए दान का बखान नहीं करना चाहिए –फिर मैं इस बारे में लेख क्यों लिख रहा हूँ?

इसका पहला कारण तो यह है कि मैं अपनी इस स्वीकृति को “दान” नहीं मानता। यह दान नहीं बल्कि मेरा कर्तव्य है जिसे मैंने निभाया है। मेरी माता और प्रकृति माँ ने मेरे शरीर के अंगो का निर्माण करने और उन्हें पोषित करने में अपने बहुत से संसाधन लगाए हैं। मानव अंग इतने जटिल होते हैं कि हम आज तक इनके जैसी मशीने तैयार नहीं कर पाए हैं। ऐसी स्थिति में प्रकृति के इन वरदानों को मरने के बाद व्यर्थ जाने देना –मेरी समझ के मुताबिक उचित नहीं है।

दूसरा कारण यह है कि इस लेख को पढ़ने के बाद शायद मेरे पाठकों में से कुछ ऐसा ही कदम उठाने के बारे में गंभीरता से सोचें। आप चाहे जिस भी मत या सम्प्रदाय से संबंधित हों –लेकिन रक्तदान, नेत्रदान और अंगदान के बारे में नई दृष्टि से सोचना आरंभ करें। हम सभी जानते हैं कि हमारे समाज इन चीज़ों को लेकर बहुत-सी भ्रांतियाँ हैं। रक्तदान से शरीर कमज़ोर होता है; नेत्र या अंग दान करने से अगले जन्मों में हमें वे अंग नहीं मिलते इत्यादि… लेकिन, समझदार पाठकों, आप जानते हैं कि ये सब बातें पुरानी और आधारहीन हैं। आज हमारे पास विज्ञान के दिए हुए तथ्य हैं। हमें नई जानकारी की रोशनी में इन सब बातों पर विचार करना चाहिए।

भगवान ना करे ऐसा हो लेकिन यदि आपको या आपके किसी प्रियजन को रक्त, नेत्र या किसी अन्य अंग की ज़रूरत आ पड़े तो आप किसी अन्य व्यक्ति से यह दान लेते समय तो नहीं झिझकते ना? फिर स्वयं दान देने में हिचक क्यों?

उन लोगों के बारे में सोचिए जिन्होनें कभी प्रकाश देखा ही नहीं… वो जो अस्पतालों में पड़े जीवन और मृत्यु से जूझ रहे हैं…

आगे बढिए और आज ही रक्तदान, नेत्रदान व अंगदान कीजिए। यह हम सबका कर्तव्य है।

Saturday, February 11, 2012 को पोस्ट किया |

आपने इसके बारे में सुना तो बहुत होगा –लेकिन शायद कभी देखा ना हो! आज मुझे एक दुर्लभ-सी तस्वीर मिली। इस तस्वीर को देखने की मन में बरसों से बहुत इच्छा थी। देर से ही सही लेकिन आज इसके दर्शन हो गए! यह तस्वीर 26 जनवरी 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान में उस समय ली गई थी जब लता मंगेशकर ने पंडित नेहरू और हज़ारों अन्य लोगों के समक्ष “ऐ मेरे वतन के लोगों” गीत को गाया था। आइये मैं आपको चित्र भी दिखाता हूँ और इसके बारे में जानकारी भी देता हूँ।

26 जनवरी 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान में लता मंगेशकर

हिन्दी के महान कवि “कवि प्रदीप” ने केवल दो महीने पहले ही समाप्त हुए भारत-चीन युद्ध की विभीषिका से द्रवित होकर “ऐ मेरे वतन के लोगों” शीर्षक के इस गीत की रचना की थी। इस गीत को लिखने की प्रेरणा प्रदीप जी को 13वीं कुमाऊं रेजिमेंट के अहीरों की सी (यानि “चार्ली”) कम्पनी द्वारा रेज़ांग ला दर्रे पर लड़ी गई अंतिम लड़ाई से मिली थी। हमारे जवानों की इस कम्पनी ने तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करते हुए एक ऐसा युद्ध लड़ा जो विश्व-सैन्य इतिहास में अमर हो गया। इस कम्पनी का नेतृत्व शूरवीर मेजर शैतान सिंह ने किया और वीरगति पाई थी। उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

रेज़ांग ला दर्रे की स्थिति कुछ ऐसी थी कि चार्ली कम्पनी को भारतीय तोपखाने की मदद नहीं दी जा सकती थी। भारतीय तोपखाने और चार्ली कम्पनी के बीच एक बड़ी पहाड़ी दीवार बन कर खड़ी थी। ऐसे में कम्पनी के जवानों ने बिना तोपखाने की मदद के लड़ाई लड़ी –ऐसी लड़ाई का अंजाम सभी को मालूम था। कम्पनी के कुल 123 जवानों में से 114 शहीद हो गए –लेकिन मरने से पहले उन्होनें एक हज़ार से भी अधिक चीनी सैनिकों का ख़ात्मा कर दिया। इस लड़ाई के बाद युद्ध-स्थल का दौरा करने वाले मेजर-जनरल इआन कार्डोज़ो ने लिखा:

हम जब लड़ाई के बाद रेज़ांग ला पहुँचे तो खंदकों में हमारे जवान मरे पड़े थे –लेकिन उनके हाथों में अभी भी बंदूकें थीं। इस कम्पनी का हर एक जवान वहाँ अपनी-अपनी खंदक में मृत पाया गया। हरेक के शरीर पर गोलियों और छर्रों के अनेकों घाव थे। 2-इंच की मोर्टार चलाने वाला जवान मर चुका था –लेकिन वह अभी भी हाथ में दुश्मन पर फेंकने के लिए बम थामे हुए था। फ़ौजियों की दवाई-पट्टी करने वाले सिपाही को जब चीनी गोली लगी तब भी उसके हाथ में इंजेक्शन और पट्टी थी। एक हज़ार हथगोलों के ज़खीरे में से हमारे जवानों को केवल सात हथगोले फेंकने का मौका मिला –और चीनी सिपाहियों ने मोर्टार सेक्शन को रौंद डाला।

इन शब्दों से पता चलता है कि हमारे जवान आखिरी पल तक लड़े। इस प्रसिद्ध कम्पनी के अधिकांश जवान हरियाणा के अहीरवाल श्रेत्र के अहीर लोग थे (इस श्रेत्र में रेवाड़ी और महेन्द्रगढ़ जिले आते हैं)। कवि प्रदीप ने इसी चार्ली कम्पनी की बहादुरी से प्रभावित होकर उन्हें “ऐ मेरे वतन के लोगों” गीत के रूप में एक अमर भेंट दी। इस गीत को संगीतकार सी. रामचंद्र ने संगीतबद्ध किया और फिर इसे अपनी दिल छू लेने वाली आवाज़ दी स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने।

प्रस्तुत चित्र में पंडित नेहरु भी दिखाई दे रहे हैं। लता का गीत ख़त्म होते-होते पंडित नेहरू की आंखों में आंसू आ गए थे और उन्होनें लता जी को कहा था “बेटी तूने मुझे रुला दिया”…

आज इस तस्वीर को देखकर मैं रोमांचित हूँ।… यदि आपके पास 26 जनवरी 1963 को रामलीला मैदान में लता द्वारा गाए गए इस गीत की वीडियो रोकॉर्डिंग हो तो मुझे ज़रूर बताएँ –मैं आभारी रहूंगा।

मैं यह अपील भी करूंगा कि दशमलव के पाठक इस लेख को जितना हो सके शेयर करें –ताकि अधिक से अधिक लोग इस तस्वीर के बारे में जाने और हमारे शहीद सैनिकों को नमन करें। आइये इस गीत को सुनते हैं:

Thursday, February 9, 2012 को पोस्ट किया |

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जयपुर साहित्यिक मेले के दौरान कई लोगों ने मुझसे कहा कि हिन्दी काव्य में नए लोगों को आगे आने का अवसर नहीं मिलता। लोग सरकारी संस्थाओं से निराश लगे। उनका कहना था कि ये संस्थाएँ नए साहित्य सर्जकों को बढ़ावा देने के अपने दायित्व को ठीक से नहीं निभा रही हैं। इसलिए शोहरत पा चुके लोग ही घूम-फिर कर साहित्यिक मंचो पर दिखाई देते रहते हैं। नए रचनाकारों के लिए कोई मंच उपलब्ध नहीं है।

इस बात का संज्ञान लेते हुए आज से कविता कोश में एक नया कार्य आरंभ किया जा रहा है। कविता कोश आज स्वयं एक लोकप्रिय और महत्तवपूर्ण मंच बन चुका है; तो क्यों ना इसकी लोकप्रियता का लाभ नए रचनाकारों को भी दिया जाए। इसके लिए अब से किसी एक रचनाकार को कविता कोश “रेखांकित” किया करेगा। रचनाकार का नाम और उनके पन्नें का लिंक कविता कोश में सबसे ऊपर दिखाई देगा ताकि पाठक आसानी से उस रचनाकार की रचनाओं तक पहुँच सकें।

यह स्वभाविक ही है कि अधिकांश पाठक कविता कोश में प्रतिष्ठित रचनाकारों को बहुधा खोजते हैं लेकिन हज़ारों रचनाकारों की लम्बी सूची में अधिकतर रचनाकार कुछ दबे-से रह जाते हैं। कविता कोश की यह पहल इस समस्या को कुछ हद तक हल करने में मदद करेगी।

कृपया ध्यान दें कि हम रेखांकन केवल उन्हें रचनाकारों में से करेंगे जो कविता कोश की रचनाकारों की सूची में शामिल हैं। सूची में नाम शामिल करने की प्रक्रिया पहले की ही तरह बनी रहेगी।

रेखांकन “अपेक्षाकृत कम जाने-माने” रचनाकारों का किया जाएगा। इसमें नए और पुराने दोनों तरह के रचनाकार शामिल हो सकते हैं। इस सुविधा का मूल उद्देश्य पाठकों को उन रचनाकारों तक पहुँचाना है -जहाँ तक वे जानकारी के अभाव के कारण नहीं पहुँच पाते।

फ़िलहाल यह कार्य प्रयोग के तौर पर शुरु किया जा रहा है। मैं जानता हूँ कि स्वयं को रेखांकित कराने के लिए रचनाकार कविता कोश टीम के सदस्यों से आग्रह करेंगे। यहाँ मैं यह स्पष्ट कर देना चाहूँगा कि इस तरह का कोई भी आग्रह स्वीकार नहीं किया जाएगा। अन्य सभी मसलों की तरह ही रेखांकन मे मामले में भी कविता कोश टीम सर्वाधिकार सम्पन्न है और रहेगी। हम अपने विवेक के अनुसार निर्णय करेंगे। रेखांकन की कोई समय सीमा भी निर्धारित नहीं की रही है। रेखांकित रचनाकार कम से कम एक दिन तक तो रेखांकित रहेगा लेकिन इसके बाद कोई रचनाकार कितने समय तक रेखांकित रहता है यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हमारे पास रेखांकित नाम बदलने के लिए समय है या नहीं।

रचनाकारों से अनुरोध है कि इस सुविधा को सुचारू रूप से चलने देने के लिए इस बाबत किसी भी किस्म का आग्रह हमें ना भेजें। यदि हम पर इस तरह का दबाव बनाया जाएगा तो इस सुविधा को बंद भी किया जा सकता है। निजी शोहरत से अधिक आपको साहित्य के भले के बारे में सोचना चाहिए। यदि हिन्दी साहित्य की स्थिति बेहतर होगी तो सभी को उसका लाभ होगा।

Thursday, February 2, 2012 को पोस्ट किया |

भोजपुरी में अश्लील गीतों का बोलबाला

अभी हालहि में मेरी मुलाकात भोजपुरी गीत-संगीत की दुनिया में बेहद लोकप्रिय एक गायक से हुई। इस मुलाकात और कई अन्य भोजपुरी भाषियों से बातचीत के दौरान मेरे ज़हन में एक ऐसी बात स्पष्ट हो गई जिसके बारे में कुछ धुंधला-सा आभास मुझे पहले से भी था।

लोकप्रिय भोजपुरी गीतों में छाई अश्लीलता के बारे में मुझे कुछ अंदाज़ा तो था लेकिन इन गीतों में अश्लीलता कितनी गहराई तक काबिज़ है यह मैं अब समझ पाया हूँ। कई भारतीय प्रांतों के लोकगीतों में गालियों का प्रयोग आम रहा है। एक बार सुनने में शायद लगे कि गालियाँ होने के कारण ये लोकगीत सुनने में अश्लील लगते होंगे। लेकिन यह पूर्णत: सत्य नहीं है। लोकगीतों में गालियाँ चुहलबाज़ी जोड़ने के लिए प्रयोग की जाती हैं। जबकि आजकल के लोकप्रिय भोजपुरी गीत खालिस अश्लील होते हैं।

जिन भोजपुरी गायक का मैंने ज़िक्र किया है; उनसे मिलने और उनके बारे में जानने के बाद मेरे मन में उत्सुकता हुई कि उनके कुछ गीत सुने जाएँ। सो, मैंने यू-ट्यूब पर उनके गीतों को खोजा और सुना। कुछ गीत तो ऐसे सामने आए जिनके शब्द सुनकर मैं अवाक रह गया। इन शब्दों को द्विअर्थी बिल्कुल नहीं कहा जा सकता –इनका केवल और केवल एक ही अर्थ निकलता है और वह बहुत ही अश्लील है। मैं पशोपेश में हूँ कि इन शब्दों को यहाँ लिखूँ या नहीं। मुझे लगता है लिखना चाहिए ताकि पाठको पता चल सके कि किस स्तर की अश्लीलता भोजपुरी के लोकप्रिय गीतों में बसी हुई है। लेकिन फिर लगता है कि इतने अश्लील गीत पढ़ कर मेरे बहुत से पाठक असहज महसूस करेंगे। इसलिए बीच का रास्ता अपनाते हुए मैं नीचे एक गीत का लिंक दे रहा हूँ और पहले से आगाह भी कर रहा हूँ कि इस गीत के बोल बहुत ही भद्दे हैं –इसे सुनने या ना सुनने के बारे में आप अपने विवेकानुसार निर्णय लें।

इन गीतों को लिखने वालों और गाने वालों से पूछा जाए तो वे कहते हैं कि हम तो वही परोसते हैं जो लोग सुनना चाहते हैं। एक तरह से देखा जाए तो पूरे का पूरा भोजपुरी भाषी समाज ही इस तर्क की लपेट में आ जाता है। क्या वाकई भोजपुरी बोलने-समझने वाले लोगों का इन अश्लील गीतों के बिना गुज़ारा नहीं है? इस पर तर्क यह दिया जाता है कि इन गीतों का अधिकतर बाज़ार उन लोगों के कारण है जो दिन भर मेहनत मजदूरी करके शाम को कुछ मौज-मस्ती की इच्छा रखते हैं। यह सुनकर मेरे मन में आता है कि क्या केवल भोजपुरी भाषी ही मेहनत मजदूरी करते हैं? या कि केवल भोजपुरी भाषी लोग ही शाम को मौज-मस्ती करते हैं?

इन गीतों को बनाने वाले लोगों द्वारा दिए जाने वाले ये सब तर्क आधारहीन हैं।

सच यह है कि भोजपुरी पर जान-बूझ कर ओढ़ी हुई अश्लीलता का कलंक लगा हुआ है। इसके चलते भोजपुरी जैसी बड़े पैमाने पर बोली जाने वाली भाषा को गंभीरता से नहीं लिया जाता। इसमें शक नहीं कि अश्लीलता बिकती है क्योंकि यह इंसान की एक नैसर्गिक ज़रूरत को पूरा करने में सहायक होती है। लेकिन क्या हमें इन पशु-सम लक्षणों से ऊपर उठ कर कलात्मक सुंदरता की खोज नहीं करनी चाहिए? अश्लीलता को गीत-संगीत में पिरो कर बेचने से केवल कुछ ही लोगों का भला हो रहा है (क्योंकि उन्हें पैसा मिल रहा है) –लेकिन साथ ही एक भरा-पूरा समाज इस तरह की संस्कृति के चलते विकृत होता जा रहा है।

इन गीतों के वीडियोज़ को देखने से मालूम पड़ता है कि इनमें दिखने वाले “नायक” और “नायिका” किस तरह के बर्ताव को “आदर्श” बनाकर नौजवानों के आगे परोस रहे हैं। हम सभी जानते हैं कि टी.वी. स्क्रीन पर दिखने वाले लोग किस हद तक हमारी नई पीढ़ी की सोच को प्रभावित करते हैं। नौजवान टी.वी. पर दिखने वाले लोगों और उनके व्यवहार को ही आदर्श मान कर अपना लेते हैं। ऐसे में क्या इन छिछोरे वीडियोज़ में दिखने वाले सस्ते कलाकारों की सस्ती नौटंकी हमारी नई पीढ़ी को सस्ते माल में नहीं बदल देगी?

यह भोजपुरी बोलने वाले प्रबुद्ध लोगों का कर्तव्य बनता है कि वे अपनी भाषा पर लगे इस कलंक मिटाने के लिए प्रयास करें। भोजपुरी में राहुल सांकृत्यायन जैसे महापंडित ने साहित्य रचना की है –इसी भाषा को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और लालबहादुर शास्त्री जैसे विद्वानो ने प्रयोग किया है। आज इस भोजपुरी की ऐसी दुर्दशा देखकर मन दुखी होता है।

भोजपुरी की बेहतरी में अपना योगदान देने के लिए मैं यह निश्चय कर चुका हूँ कि कविता कोश में अच्छे भोजपुरी काव्य के लिए एक अलग से विभाग बनाया जाएगा –ताकि इस भाषा का सकारात्मक रूप भी लोगों के समक्ष आ सके।

Sunday, January 29, 2012 को पोस्ट किया |

जयपुर साहित्यिक मेले में कविता कोश

जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया। यह पहली बार था जब मैंने इस मेले में शिरक़त की। मेले के दौरान जयपुर में बिताए गए 6 दिन बहुत बढ़िया रहे –और इसके लिए मैं इस मेले के आयोजकों को श्रेय देना चाहूंगा। इतना बड़े कार्यक्रम को आयोजकों ने जिस खूबी से पूरा किया, वह काबिले-तारीफ़ है। जयपुर के निवासियों द्वारा जिस तरह से सत्कार किया गया –उससे तो मन भाव-विभोर हो उठा।

मेले के दौरान मेरे दोनों सत्र काफ़ी अच्छे रहे। लोगों की कविता कोश परियोजना में रुचि और इससे संबंधित जिज्ञासा को देखकर बहुत प्रसन्नता हुई। इससे भी अधिक अच्छा यह देखकर लगा कि जनता कविता कोश का लगातार विकास चाहती है। बहुत से व्यक्तियों ने कोश को विकसित करने हेतु अपने-अपने सुझाव मुझे दिए। कई विदेशी मेहमानों से भी मुलाकात हुई जो हिन्दी जानते हैं और कविता कोश का प्रयोग करते हैं।

जयपुर मेले की सबसे बड़ी खबर तो आपको पता ही है। सलमान रुश्दी आएंगे या नहीं, लोगों से मुखातिब होंगे या नहीं -यह असमंजस आखिर तक बना रहा। अंत में हुआ ये कि ना तो रुश्दी आए और ना ही उनकी वीडियो कॉन्फ़्रेंस हो पाई। चूंकि जयपुर में लेखकों का बड़ा जमावड़ा था –इसलिए सारी रायशुमारी रुश्दी के पक्ष में ही रही। बहुत कम लोग थे जिन्होंने पूरी परिस्थिति को एक अलग कोण से देखा और रुश्दी के रवैये की खिलाफ़त में कुछ कहा। व्यक्तिगत-रूप से मैंने रुश्दी के मसले पर चुप्पी साधे रखी और अनौपचारिक समूह चर्चाओं में इस मुद्दे पर कुछ नहीं कहा। हालांकि मुझे लगता है कि लेखकगणों ने रुश्दी की पैरवी कुछ अधिक ही कर डाली और सिक्के के दूसरे पहलू को देखने से इंकार कर दिया।

ओपराह विन्फ़्रेह के मेले में आने को बहुत से लोगो ने “तमाशा” करार दिया। हालांकि ओपराह एक प्रेरणादायी हस्ती हैं लेकिन एक तबके का कहना था कि ओपराह को मेले में केवल ग्लैमर भरने के लिए आमंत्रित किया गया है। जिस भव्य तरीके से ओपराह का स्वागत सत्कार किया गया वह भी कुछ लोगों को नागवार गुज़रा। ओपराह के सत्र के दौरान पूरा स्थान खचाखच भरा था –श्रोताओं में अधिकांश महिलाएँ थीं।

मेले के दौरान गुलज़ार को सुनना अपने आप में एक दिव्य अनुभव रहा। गुलज़ार की उम्र जैसे-जैसे बढ़ रही है वैसे-वैसे ही वे और अधिक आकर्षक लगने लगे हैं!

मुझे लगता है कि मेले का अगला शायद डिग्गी पैलेस होटल में ना हो पाए –क्योंकि यह जगह अब मेले के लिए छोटी पड़ने लगी है।

हालांकि आयोजकों ने इस बार हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं को मेले उभार कर प्रस्तुत करने की पुरजोर कोशिश की –लेकिन फिर भी मेले में भारतीय भाषाएँ कुछ दबी-दबी सी लग रही थीं। हिन्दी के लिए कई सत्र रखे गए पर इन सत्रों में भी अंग्रेज़ी छाई रही। ज़रा सोच कर देखें तो अंग्रेज़ी जयपुर मेले जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच की ज़रूरत है –यह तो हमें स्वीकारना ही पड़ेगा। भारत की कोई भी भाषा अंग्रेज़ी की तरह ग्लोबल भाषा होने का दावा अभी नहीं कर सकती। इस तरह के मेलों में आए विभिन्न देशों के लोगों के बीच अंग्रेज़ी ही वार्तालाप का माध्यम बनती है। सो, जयपुर मेले में भारतीय भाषाओं को एक सीमा से अधिक उभार पाना मुश्किल काम है। हालांकि अभी यह मेला उस सीमा को छूने से काफ़ी दूर है।

मेले के आयोजन से संबंधित हर पक्ष में स्वयंसेवकों ने बहुत महत्तवपूर्ण भूमिका निबाही। स्वयंसेवकों का एक बड़ा दल हर छोटे-बड़े काम को अंजाम देने व्यस्त दिखाई देता था। नौजवानों ने जिस कुशलता से मेले के दौरान व्यवस्था को संभाला –वैसा मैंने भारत में होते पहले कभी नहीं देखा था। अन्य आमंत्रित अतिथियों की तरह ही मेरी हर ज़रूरत का ख़्याल इन स्वयंसेवकों ने रखा। इसके लिए मैं इन स्वयंसेवकों का आभारी हूँ और इन सभी के उजले भविष्य की कामना करता हूँ।

जयपुर का अनुभव सुखद रहा। अब कार्य में जुटने का समय है ताकि अगले बरस के मेले में कविता कोश को नई शानो-शौकत से ले जाया जा सके।

Friday, January 27, 2012 को पोस्ट किया |

...

आज जयपुर साहित्यिक मेले 2012 का आखिरी दिन है। मैं अपने होटल के कमरे में बैठा हुआ यह लिख रहा हूँ। मेले में कुछ ही देर बाद रिचर्ड डॉकिन्स अपनी पुस्तक The Selfish Gene के बारे में बात करने वाले हैं। हालांकि मैं डॉकिन्स की कई बातों से सहमत नहीं हूँ लेकिन फिर भी एक विचारक के रूप में मैं उनका बहुत सम्मान करता हूँ। डॉकिन्स की अपेक्षा मैं (स्टीफ़न) हॉकिन्ग से अधिक इत्तेफ़ाक रखता हूँ।

बहरहाल, मुझे नहीं लगता कि मैं रिचर्ड डॉकिन्स को सुनने के लिए उनकी सभा में जा पाऊँगा। शरीर में एक अनबूझी-सी थकान और दर्द ने घर कर रखा है। यह ऐसी थकान है जिसके होने का कोई भी कारण मैं नहीं बता सकता। सारी दुनिया के डॉक्टर, हालांकि, इस स्थिति को पोस्ट पोलियो सिन्ड्रोम (PPS) के नाम से जानते हैं। पोलियोवायरस के शिकार व्यक्ति पोलियो होने के 15 से 25 वर्ष बाद इस स्थिति से जूझते हैं। जिस तरह पोलियो का असर अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग होता है –उसी तरह PPS की स्थिति भी विभिन्न लोगों में अलग-अलग तीव्रता के साथ प्रकट होती है।

पोलियो वायरस अपने शिकार के कुछ अंगो से उनकी शक्ति छीन लेता है; और हमले से बच गए अंगो पर ही जीवन को आगे खींचने का सारा भार आ पड़ता है। करीब 15 से 25 वर्ष बाद ये स्वस्थ अंग अपने पर पड़े इस अतिरिक्त भार को उठाते-उठाते समय से पहले ही थकने लगते हैं। इसी स्थिति को PPS कहा जाता है। शरीर में बिना कारण दर्द और थकान PPS का सबसे स्पष्ट लक्षण है। पोलियो की ही तरह सारी दुनिया में कहीं भी PPS का कोई इलाज नहीं है। आलम यह है कि किसी भी डॉक्टर के लिए पूरे विश्वास के साथ यह कहना मुश्किल है कि फ़लां व्यक्ति को PPS है।

ज़िन्दगी कितनी असहाय-सी हो जाती है जब कि आपका मन उड़ान भरने को आतुर हो और आपका शरीर साथ छोड़ देने पर आमादा लगे। अब जीवन का अर्थ कुछ-कुछ समझ में आने लगा है तो अपना ही शरीर एक पहेली बन गया है। आज जब लगता है कि मैं पूरा संसार अपनी बांहो में भर सकता हूँ –तो लगता है कि बांहे अब फैल ही नहीं पा रहीं। आज मैं हज़ारों लोगों का प्रेरणा स्रोत हूँ –लेकिन खुद के पांवों को चलने की प्रेरणा दे सकना कितना दुष्कर हो गया है।

पोलियो-ग्रस्त जीवन में सम्मान व बराबरी पाने की जद्दो-जहद में ही सारा जीवन बीत गया। अब जब जीने का और कुछ अर्थपूर्ण कर सकने का समय आया है तो…

लेकिन… मेरा ध्येय वाक्य आज भी वही है जो हमेशा रहा है…

“ललित टूट सकता है, लेकिन हार नहीं सकता”

थकान और पीड़ा चाहे जितनी भी हो… इस शरीर को चलना ही होगा…

 

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Tuesday, January 24, 2012 को पोस्ट किया |